तुम्हारी खोज से क्लान्त हो आश्रय लिया जहाँ....... वो है विहँग नीड़

शुक्रवार, 6 अप्रैल 2018

प्रेम रहस्य

प्रेम प्रेम जिस्मानी ? नही रे रूहानी प्रेम निराधार प्रेम का क्या स्वरूप प्रेम का कैसा पैमाना प्रेम छलकता तो रिश्तों को निकट लाता प्रेम उम्र का कब रूह का है गुलाम प्रेम की पिपासा उस चातक सम, स्वाति की एक बून्द सी अभिलाषा प्रेम आरोह अवरोह नही न ही अवरोध प्रेम तीव्र सप्तक प्रेम है मर्यादित तो कहीं प्रेम उन्मुक्त खग विहंग सी प्रेम अविरल प्रेम आस्था प्रेम है विश्वास प्रेम में सृष्टि सृष्टि में प्रेम प्रेम अलौकिक प्रेम कबीर तो कहीं मीरा प्रेम है सूफी पर यायावर नही प्रेम ठहराव पर भटकन नही प्रेम विष पर अमृत सा प्रेम उन्मुक्त तो प्रेम नीड़ भी प्रेम है अशोक सीता जिसकी शरणार्थी प्रेम रुद्र प्रेम वेद,वेदांत और उपनिषद भी प्रेम सार है सारथी भी प्रेम प्रेम है जिज्ञासा अविराम नही कभी प्रेम माघ कभी जयेष्ठ सी कभी सावन कभी फागुन,बसन्त प्रेम मेघ मल्हार सा कभी राग भैरव सा प्रेम आच्छादित प्रेम भग्न नही प्रेम बहता नीर सा प्रेम रमता जोगी सा प्रेम सागर सा गम्भीर या कहीं मरुस्थल की मृगतृष्णा प्रेम कहीं प्लावित धरती तो कहीं बंजर धरती सा प्रेम के कई रूप कई स्वरूप हा मानव ! बिन प्रेम क्या तेरी कथा? कैसी तेरी व्यथा? कैसी तेरी गाथा? मौली