तुम्हारी खोज से क्लान्त हो आश्रय लिया जहाँ....... वो है विहँग नीड़
बुधवार, 30 मार्च 2016
प्रतीक्षा
सावन बीता,भादों बीता
,बीता शरद और हेमन्त
बीता ऋतुराज बसंत भी
बीता टेसू संग फागुन
पर रीता रहा तन मन
किस ऋतु तुम सुध लोगे
पूछे अब खग विहंग
इक इक पल लगे हैं सदियाँ
कितनी करूँ मनुहार
न ध्यान लगे प्रभु में, न
भक्ति ही करी जाय
साँझ सवेरे जपूं तुझी को
तुझी में खोजूं सार जीवन
की
समझे कौन पीर जिया की
विरह वेदना से मर्माहत मैं
करूँ तुझे सुमिरन
नयन बहे अविरल
ढूंढे तुझे हरपल।।
मौली
तेरे ही रंग में रंगना चाहूँ पिया मैं
तेरे प्रेम का ही सोलह श्रृंगार करूँ मैं
तेरे ही ह्रदय के तरंगों पे करूँ नृत्य मैं
तेरी गीत तेरी ग़ज़ल तेरी ही कविता की शब्द मैं
तेरे ही बांहों के हाला में कैद होना चाहुँ मैं
तुझे ही चाहुँ तुझसे चुराकर तुझमे ही समां जाऊँ
आराध्य भी तू दुआ भी तू,तू ही पूण्य का फल
तू ही आदि तू ही अंत दूजा न कोई मेरे संग
मैं चातक जन्मों की प्यासी स्वाति की ही अभिलाषी
प्रिय आलिंगन के मोहपाश में बंधने को आतुर
बन गुजरिया राह तकूँ मैं
तू न समझे पीर पराई .... किस विध जतन करूँ पिया मैं,तेरे दर्शन पाऊँ
तेरे ही रंग रंगकर मैं अधरों पे सज जाऊँ.....
बन मुरली की धुन तरंगित मैं हो जाऊँ....
मौली
बुधवार, 23 मार्च 2016
अबके फागुन
अबके फागुन
कुछ यूँ मनायें
नफरतों को करें दहन
प्रेम का अलख जलायें
खेली बहुत खूनी होली
बोलें अब इंसानियत की बोली
फैली हर तरफ वैमनस्यता की आग
अबके फैलायें मोहब्बतों का फाग
नफरतों को तजकर एक मिसाल बनायें
आओ मिलजुल कर मित्रता का उत्सव मनायें
धर्म जाति मन्दिर मस्ज़िद के परे
मानवता का एक सुंदर अध्याय रचें
देशहित का ध्यान धरें
मातृ भूमि को नमन करें
प्रेम के सतरंगी रंगो में रंगकर
शांति का नया इतिहास रचकर
चलो न सब नित नये त्यौहार मनायें
अबके फागुन कुछ यूँ मनायें।।
मौली
मंगलवार, 22 मार्च 2016
सोमवार, 21 मार्च 2016
सोमवार, 14 मार्च 2016
यक्ष प्रश्न
एक प्रश्न
जो कभी
नौनिहाल था
फिर तरुण हुआ
तत्पश्चात युवा
और फिर वृद्धावस्था
वो प्रश्न आज भी
प्रश्नवाचक चिन्ह
लिए ज्यों का त्यों
विधमान है।
अंततगोत्वा वो
यक्षप्रश्न बना हुआ है
क्या इस प्रश्न का उत्तर
ईमानदारी से कोई दे
पायेगा??
बूढ़ा जर्जर हो चला
प्रश्न और उत्तर...
नवयौवना सी इठलाती
चंचल नदी की मानिंद
उफनती उछलती
हर सीमाओं को लांघती
चली जा रही,बेचारा प्रश्न
आज भी उलझा अपनी
ही जाल में....
क्या हम मनुष्य का जन्म
पाकर भी मनुष्य बन पाएं
क्या हम अपने जन्म
को सार्थक कर पायें
कर्म धर्म का सामान्य
अर्थ भी समझ पायें
पशुओं को भी शर्मशार
कर हम इंसान कहलाते
हैं,ग्लानि का बोध तक
नही क्यों?
मौली
शनिवार, 12 मार्च 2016
यक्ष प्रश्न
एक प्रश्न
जो कभी
नौनिहाल था
फिर तरुण हुआ
तत्पश्चात युवा
और फिर वृद्धावस्था
वो प्रश्न आज भी
प्रश्नवाचक चिन्ह
लिए ज्यों का त्यों
विधमान है।
अंततगोत्वा वो
यक्षप्रश्न बना हुआ है
क्या इस प्रश्न का उत्तर
ईमानदारी से कोई दे
पायेगा??
मनुष्य रूप देकर
परमात्मा ने हमे भेजा
पर क्या हम अपने जन्म
को सार्थक कर पायें
कर्म धर्म का सामान्य
अर्थ समझ पायें
पशुओं को भी शर्मशार
कर हम इंसान कहलाते
हैं,ग्लानि का बोध तक
नही क्यों?
मौली
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