रात मुझसे कुछ खफ़ा खफ़ा सा रहने लगा
सूरज को जुड़े में टांक लिया जब से मैंने।।
मौली
तुम्हारी खोज से क्लान्त हो आश्रय लिया जहाँ....... वो है विहँग नीड़
शुक्रवार, 9 फ़रवरी 2018
नज़्मों का आंगन
क्यों चले आते हो
दबे दबे पांवों से
मेरे नज़्मों के आंगन में
ज़ज्बातों के डेरे है
अरमानों के रेलें हैं
मेरे नज़्मों के आंगन में
कितने गिरह खुले हैं
कितने अभी बाकि है
मेरे नज़्मों के आंगन में
रंजिशों के मेले हैं
बन्दिशों के घेरे हैं
मेरे नज़्मों के आंगन में
रुमानियत की चाहत है
हैवानियत की सांकल है
मेरे नज़्मों के आंगन में
मौली
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