तुम्हारी खोज से क्लान्त हो आश्रय लिया जहाँ....... वो है विहँग नीड़

मंगलवार, 31 दिसंबर 2013

३७-





जमाने में हम हुए रुसवा मगर
ज़िक्र तेरा न करेंगे कभी अब
तनहा वीराने में रो लेंगे, पर
शिकवा न करेंगे तुमसे अब।।

__ मौली

३६-




गमों का बोझ तो उठाते रहे हैं हम जमाने से
जब ज़िन्दगी बोझ बन जाये उसे उठायें कैसे।

__ मौली

३५- मेरे रहनुमा हो तुम





तलाशती थी सदियों से जिसे,
मेरे ख्वाबों की वो ताबीर हो तुम
जर्रे-जर्रे पर उकेरती रही
जिस अक्स को वो हाला हो तुम।।

जन्म-जन्मान्तर की मेरी तपस्या के वरदान हो तुम
मेरी तिमिर ज़िन्दगी में आफ़ताब बन आये हो तुम।।

मेरे सूने मरुथल में आबसार बन आये हो तुम
किसी देवता के भेजे हुए कोई दूत हो तुम।।

मेरे रहबर, मेरे रहनुमा हो तुम
.................मेरे रहनुमा हो तुम।।

__ मौली

सोमवार, 30 दिसंबर 2013

३४-





वो न आयें तो दिल में खलिश सी होती है
आ जायें तो और भी बढ़ती जाती है खलिश।

__ मौली

३३-




तसव्वुर में थी कभी जिनके दीदार की चाहत
बन कर हकीकत निगाहों में आ बसा वो अब।

__ मौली

३२- अश्क अपने पीते रहे





दर्द सहा न जाता मगर
दर्द फ़िर भी सहते रहे
मौत की ख्वाहिश में
हम तमाम उम्र जीते रहे
सिसकियों को दफ़्न कर
अश्क अपने हम पीते रहे।।

__ मौली

मंगलवार, 24 दिसंबर 2013

३१- रात मेरी यूँ सँगीन





यादों को आने से कौन रोक पाया भला
कदम उस तरफ़ मुड़ते हैं आज भी
जिधर उनके कदमों की आहट थी कभी
हर दस्तक अब भी चौंकाती है मुझे
सहर न होगी रँगीन फ़िर कभी
दिल भी है गमगीन, रात मेरी यूँ सँगीन।।

__ मौली

३०- स्वर मेरे बिखर गये





सोचा न था यूँ बेरँग होगी मेरी शाम
तेरी जुस्तज़ू थी जमाने से
देख अक्सर आँखों का बेबाक तकाज़ा
दिल के हिलोरों को अक्सर रोका मैने
रचा था तुमने सप्तक प्यार का
आरोह तुम तो अवरोह मैं बनी
गीत के लिपिबद्ध होने से पहले
न जाने क्यों स्वर बिखर गये
तेरा अवरोह धूमिल हो गया
स्वर मेरे बिखर गये....।
स्वर मेरे बिखर गये.....।।

__ मौली

२९-





तेरी दीवानगी का हुआ ये असर
खुद को ही मैं अब बिसरा चली
याद आये जब-जब तेरी गली
घर अपना ही मैं ठुकरा चली।।

__ मौली

२८- ज़िन्दगी खफ़ा है मुझसे





फ़िसलती जा रही ज़िन्दगी मुठ्ठी से रेत की मानिन्द
कतरा-कतरा सा लहू भी ज़ज़्ब होता सा लगे
ज़िन्दगी खफ़ा है मुझसे आज न जाने क्यों
और तुम दिल लगाने की बात करते हो
डबडबाई-बुझती आँखों से मुस्कुराने की बात करते हो
मद्धिम होती बुझती साँस से लौ लगाने की बात करते हो
क्यों श्मशान से वापस आने की बात करते हो......
...... श्मशान से वापस आने की बात करते हो......।।

__ मौली

सोमवार, 23 दिसंबर 2013

२७-





तपते हुए रेगिस्तान में
ये कौन फ़ूल खिला गया
मेरे सूने मन-मन्दिर में
ये कौन शिवाला बना गया।।

__ मौली

२६- गीत विरह के





फ़िर आयी सँध्या सिंन्दूरी
फ़िर सुधियों के बादल छाये
फ़िर जागी अन्तर की पीड़ा
फ़िर अश्रुपूरित नयनों से
अविरल बहती अश्रुधार
फ़िर मन के सूने आँगन में
डोल गयी तेरी परछाँईं
फ़िर भूली गीत मिलन के
फ़िर गाये गीत विरह के।
फ़िर गाये गीत विरह के।।

__ मौली

गुरुवार, 19 दिसंबर 2013

२५- मेरे शब्द मुझसे ही रूठ गये






आज मेरे शब्द मुझसे ही रूठ गये
कहीं मात्रा तो कहीं छन्द छूट गये
मन में है वेदना, आत्मा पे है बोझ
आँखों में हैं आँसू, दिल है पुरसोज़
होठों पे आह जैसे डूबती हुई सदा
खुद से ही खुद हो गई आज मैं ज़ुदा
लगता है इसी लिये ही शायद.....
आज मेरे शब्द मुझसे ही रूठ गये..
आज मेरे शब्द मुझसे ही रूठ गये.. ।।

__ मौली

मंगलवार, 17 दिसंबर 2013

२४-





कर्म भूमि पे फ़ल के लिये कर्म सबको करना पड़ता है
ईश्वर केवल लकीरें देता है रँग हमको भरना पड़ता है।

__ मौली

२३-





बदलते हुए मौसम के हर रुख को देखा
तूफ़ान में डूबती हुई कश्तियों को देखा
परिन्दों के उजड़ते हुए घोसलों को देखा
कुदरत के खौफ़नाक मँजर से परे हमने
इंसान की बदलती हुई फ़ितरत को देखा।।

__ मौली

सोमवार, 16 दिसंबर 2013

२२-






किसी के आने की आहट से मन हिंडोले लेने लगा
वीरान पड़े मन-मन्दिर में कौन शिवाला बना गया
तपते हुए रेगिस्तान को ये कौन गुलशन बना गया
..........मेरे मन-मन्दिर में कौन शिवाला बना गया।।

__ मौली

२१- आ बसा आँखों में कोई





गुमसुम सी बैठी मैं
किसी की यादों में खोई
आँखों से नींदें,
होठों से मुस्कान भी गुम है,
अचानक दिल में एक हूक सी उठी,
आत्मा रोई, हृदय चीत्कार उठा,
पर, आँख न जाने आज क्यों न रोई,
अचानक एक आँसू मेरी आँख से टपका,
मैंने पूछा, अरे तू क्यों बाहर छलक आया,
आँसू बोला, मैं कैसे रहूँ आँखों में,
वहाँ तो पहले से ही कोई और बसा है,
अब मेरी यहाँ क्या दरकार
अब न रहा मेरा इन आँखों से कोई सरोकार.....।।

__ मौली

शुक्रवार, 6 दिसंबर 2013

२०-





इश्क ज़ज़्बाए-पाकीज़गी है
जो खुदा ने नेमत मे दी है
जमाने से हमें खौफ़ कैसा
कायनात ने भी मँजूरी दी है।।

__ मौली

गुरुवार, 5 दिसंबर 2013

१९-





देख कर खुशियाँ दूसरों की लोग नाहक ही जला करते हैं
कभी किसी का गम बाँट के देखो मिलता है सुकूँ कितना।

__ मौली

१८-





तपते मौसम की तपिश से कुम्हलाई थी मैं
आई जो सदा तेरी फ़िर से खिल उठी हूँ मैं
तेरे निर्बाध प्रेम की महक से खिंची आई मैं
तेरे इश्क में एक उम्र क्या हर उम्र वार दूँगीं मैं।।

__ मौली

१७-





बज़्म में मेरे आकर कह जाओ
कोई कसीदा मेरे हुस्न पर कभी
एक कयामत आ जाये महफ़िल में
जिसकी मुंतज़र हूँ जमाने से।।

__ मौली

१६-





शमा जलती रही तड़फ़ कर रातभर
परवाना भी जला किया रातभर
मकरँद की चाह में भौंरा भी देखो
कैद होता रहा गुले-आगोश में रातभर।।

__ मौली

१५- चुपके से





ख्वाबों में क्यों चले आते हो चुपके से
मेरे दिल की अनछुई धड़कन को
क्यों छेड़ जाते हो चुपके से
तुम बिन अधूरी हूँ ये जानकर भी
क्यों ठिठोली कर जाते हो चुपके से।।

__ मौली

१४- हमसफ़र





ज़ुल्फ़ों को मेरी खुलकर
अपने शानों पे बिखर जाने दे
आँखों से छलकती हुई मय को
होठों से पी जाने दे
मेरी साँसों को
अपनी साँसों में समा जाने दे
तारों को आसमाँ पे बिखर जाने दे
मौसम को थोड़ा और बदल जाने दे
बादलों को गरज कर बरस जाने दे
तूफ़ाँ को आकर गुजर जाने दे
जब साथ हो तुम मेरे हमसफ़र
तो कश्ती को मौजों पे उतर जाने दे।।

__ मौली

१३-





दर्दे-दिल देखा न जाता था, पर दर्दे-दिल देखा किया
तू न आया, मरने वाला ता-उम्र राह तेरी देखा किया।

__ मौली

१२- दिलदार





ऐ आसमाँ न कर घमन्ड ऊँचाइयों पर अपने
न कर समन्दर गुरूर अथाह गहराइयों पे अपने
न इतरा पवन झूम कर चलने पर अपनॆ
जार-जार हो जाओगे शर्म से तुम सब अपने से
जब देखोगे रुतबा तुम मेरे दिलदार का।।

__ मौली

११- हिज्र की रात





हिज्र की रात बीती
मिलन की बेला आई
मदमस्त भीगी फ़ुहारों सी
अल्हड़ सुबह पिय को सँग लाई।।

__ मौली

१०- बिछड़न





फ़िर आज चाँद रात थी, दिल में था अँधेरा व्याप्त
हमारी निगाहें थीं प्यासी, कंवारी सी
आँगन में आये थे प्रियतम मुझसे मिलने तुम,
व्याकुल एहसास थे बाकी और रात थी थोड़ी सहमी।

हम मौन, बिछड़न की चादर बिछा बैठे थे
हरसिंगार भी टूट-टूट कर बिखेर रही थी खुश्बू
चहुँ ओर चाँदनी पेड़ों के झुरमुट से
लुका छिपी खेल रही थी हमसे,
कि आके बरबस बादल ने जकड़ा था आगोश में अपने।

लाज की बेड़ियाँ थी पाँव में मेरे और तुम भी थे
न जाने किन कसमों से बँधे-बँधे से।

यकायक सागर सम विशाल भुजायें फ़ैलाये तुम
आतुर थे आलिंगन बद्ध होने को,
मैं चँचल उफ़नती नदी सी
समाँ गई तुम्हारे अगाध प्रेम में।

कहीं दूर पिहू-पिहू करता पपीहा भी चिहुँक उठा
चाँद को न देख क्रन्दन करता चातक भी
आस छोड़ बैठा आज न जाने क्यों।

उखड़ती साँसों को सहेजती,
अश्रुपूरित निगाहों से विदाई की इस बेला में
इतना ही कह पाई जाते-जाते
कुछ तेरे सपने, कुछ मेरे सपने..........
कुछ तेरे सपने, कुछ मेरे सपने..........।।

__ मौली

गुरुवार, 21 नवंबर 2013

९- विरह





विरह में तेरे मितवा तरफ़त हूँ दिन-रैन
दूर मोसे जा बसे कौन से देस
गुहारत रहूँ तोहे हर पल
तुझ बिन सूना जग सारा।।

निस-दिन राह तकूँ मैं तोरी
अब न हिय जलाओ
जो हो मोसे प्रीत साँची
सो मोहे अब आन मिलो।।

कदम्ब की छाँव, जमुना का तट
सब है सून पिया तोरे बिन
निष्ठुर बन क्यों तज गये मोहे
तुम तो जानों हिय की पीर
निर्मोही सही न जाये हृदय की व्यथा
गरवा लगा मोहे ले चल जमुना के तीर।।

__ मौली

८- प्रतीक्षा





हर पल राह देखूँ वहाँ तक
दूर जहाँ से राह मुड़ी है
मैं समझी प्रियतम तुम आये
जब-जब राह में धूल उड़ी है
पर वो तुम न थे
गुबार ही था धूल का
तकदीर न जाने क्यों
रँग बदल-बदल कर
मुझसे छल कर जाये
आशा भी न जाने क्यों
विश्वास जगा कर
मुझसे छल कर जाये... ।।

__ मौली

बुधवार, 20 नवंबर 2013

७- समर्पण





व्याकुल अवसाद से घिर रात में,
कोसों दूर नींद से,
किसी के विरह से व्यथित हृदय
और सलवटें चादर की
बयाँ करती मेरी दास्तान,
अन्तहीन रात के वो भयावह पल
इन्तजार में भोर की पहली बेला का।

पिय मिलन के प्यासे नैन,
चँचल, शोख, उफ़नाती नदी के मानिन्द,
अपने सागर से एकाकार होने को आतुर,
अपने प्रेम के उद्गार से ओतप्रोत
सारे बन्धन तोड़,
आज विशाल, विहँगम सागर में समाहित होने।

अपनी असीमित गहराइयों को छोड़
भुजायें फ़ैलाये
हुँकार की गर्जनाओं से गुँजायमान,
लालायित है,
अपनी नदी को, अपने में जज्ब करने।

अगाध प्रेम की डोर से बँध कर
दो प्रेमी आज एक दूसरे में समा गये,
मानों अधूरे थे वे, एक-दूजे के बिन
मर्यादा में बँधे, जन्मों से बिछुडे
रिक्त स्थानों को पूर्ण करते
नदी सागर की बाहों में समा गई।

मिलन के अद्भुत शुभ मुहुर्त में
आकाश भी आनन्दित हो
जल-बूँद रूपी पुष्प अर्पित करने लगा।

बादलों और विद्युज्ज्वाला ने
कौंध कर मिलन की बेला को
प्रकाशमय,
और गरज कर
अपनी शहनाई की धुन से मुखरित किया
और
सम्पूर्ण सृष्टि, सुगन्ध से सुवासित दिशाओं
तथा भोर के अलौकिक मिलन मे
इस अलौकिक प्रेम महाकाव्य की रचना हुई.....।।

__ मौली

६- रात मेरी यूँ सँगीन....





यादों को आने से कौन रोक पाया भला,
कदम उस तरफ़ मुड़ते हैं आज भी,
जिधर उनके कदमों की आहट थी कभी,
हर दस्तक अब भी चौंकाती है मुझे,
सहर न होगी रँगीन फ़िर कभी,
दिल भी है गमगीन........
रात मेरी यूँ सँगीन.........।
रात मेरी यूँ सँगीन..........।।

__ मौली

शनिवार, 16 नवंबर 2013

५- मेरा वजूद





तनहा चले थे जिन राहों पे,
उन गलियों से लगता है अब डर,
किससे कहें चलो साथ मेरे कुछ दूर,
सब तो काफ़िले में हैं मशगूल,
गुबार धूल का पूछता मुझसे मेरा वजूद,
हँस कर बोली मैं..........
तलाश में हूँ जमाने से
कहाँ है............
"मेरा वजूद"...............।।

__ मौली

शुक्रवार, 15 नवंबर 2013

४- कलम की व्यथा





आज मेरी कलम ने भी धमकी दी,
मेरा साथ छोड़ने की,
मैं अवाक, हतप्रभ सी कलम को देखती रह गयी,
मैंनें प्रश्नवाचक नजरों से कलम को देखा, तो
कलम ने कहा --
क्या तुम विदित हो अपने ऊपर होते अत्याचार से,
तुम्हे आभास नहीं अपने बिगड़ते सम्बन्धो का,
मेरे-तेरे के मध्य रिश्तों ने तुझे हताहत किया,
मूढ़मति और मूक-बधिर बन देखती रही इसे,
इस तू-तू, मैं-मैं के मंजर से
हृदय विदीर्ण हुआ,
आत्मा अतिंम साँसे लेने लगी,
आँखों से अविरल अश्रुधार बह निकली।

यहाँ तक फ़िर भी ठीक था ---
जब तक तेरे होठों से
एक आह और सिसकी भी न निकली।

तुझमें होगा धैर्य, संयम, प्रेम, सद्भावना,
पर मैं..?
मुझे तो तूने प्रेम, विरह,
देशप्रेम रिश्तों की मधुरता को
व्यक्त करने का जरिया बनाया था,
मैंने न जाना कोई दूसरा दर्द
तेरी पीड़ा से भी अनजान न थी मैं
पर आज मैनें बगावत की है,
रिश्तों ने घायल किया है
तेरी आत्मा और लेखनी को
तेरी सरलता और सहजता को
उन छलावे रिश्तों को
अब न अपनाने दूँगीं तुझे
बस, बहुत हो चुका
उठ, आज रच एक नई रचना
"नारी है संयम, धैर्य और प्रेम का संगम,
नारी है जननी, नारी है शक्ति, नारी है ममत्व का प्रतीक,"
सम्मान नहीं है नारी का
जिस धरती, देश और समाज और घर में
विनाश ही विनाश है वहाँ
नहीं है वास देवताओं का भी वहाँ।।

__ मौली

गुरुवार, 31 अक्टूबर 2013

३- प्रेम





विरह वेदना से मर्माहत मैं
पल-पल बाट जोहती रहती हूँ
राह निहारत थक गयीं अँखियाँ
नगर-हाट खोजती रहती हूँ........

रो-रो धुला अँखियन का कजरा
कुछ भी अब भाये न मोहे
रूप-रँग सब फ़ीका पड़ गया
सोलह-सिंगार भी भाये न मोहे
तुम सँग नेह लगी जब से
सखी-सहेली भाये न मोहे
फ़ीकी पड़ गई शोख चुनरिया
तड़पत जियरा तुम बिन सँवरिया
उमड़-घुमड़ कर बदरा बैरन
रही सताती जैसे हो सौतन
माटी की हो मूरत क्या तुम
मेरी व्यथा से अनजान सखा तुम
सखी-सहेली व्यंग बाण चलाती
जोगन-जोगन मुझे बुलाती......

कान्हा-कान्हा रटते-रटते
मैं जोगन बन जाऊँगी
कान्हा-कान्हा रटते-रटते
शायद संसार तज जाऊँगी
सही न जाये अब विरह की पीड़ा
आओ मोहे उबारो खेलें फ़िर जल-क्रीड़ा
फ़ीकी परी चुनरिया रँग जा आके
रँगरेज मेरे.......... रँगरेज मेरे..........

___ मौली

मंगलवार, 29 अक्टूबर 2013

२- कठपुतली





तमाशा दिखाती कठपुतली ने
पूछा हमसे इशारों से...

क्या अन्तर है तुझमें और मुझमें....
मैं काठ की पुतली हूँ
मालिक मुझे नचाता है
सरदी-गरमी, सावन भादों,
बँजारों सा भटकाता है
चँद पैसों के खातिर
नाच हमसे वो नचवाता है,
हमारा नृत्य देख
तुम सब लुत्फ़ उठाते हो....

हाड़-मास के तुम पुतले
हमसे भी गये-गुजरे हो
तुम तो बिना धागों के ही
खूब तमाशे दिखाते हो
मानवता की चादर ओढ़े
तुम रोज बर्बरता करते हो
भाई-चारे को छोड़
पीठ में खँजर भोंकते हो
रक्त-रँजित लाशों पर
अपना आशियाना बनाते हो
हैवानियत की पराकाष्ठा पार कर
वहशी दरिन्दे बन जाते हो....

अग्यानता से परिपूर्ण तुम
खुद को शासक कहलाते हो....
देख तेरी उद्दंडता
हम शर्मिन्दा हो जाते हैं....

हे ईश्वर ! तेरे हाड़-मास के पुतलों से
हम कठपुतली अच्छे हैं
खेल तमाशा करते हैं
खुशियाँ हम फ़ैलाते हैं
कठपुतली हैं हम
खेल-तमाशे दिखलाते हैं।।

_________________________ मौली

रविवार, 27 अक्टूबर 2013

१- इस रात की सुबह नहीं





सदियाँ गुजर गई उस सुबह की तलाश में
गहरी, काली भयावह रात की आदत सी हो गई मुझे,
सारी कायनात जब रात के आगोश में कैद
गहरी तृप्त निद्रा में लिप्त होती,
तो कहीं दूर...........................
एक अकेली मैं......................
कोसों दूर नींद के उस आनन्द से महरूम
सहमी, सिमटी, सकुचाई अपने ही अवसाद से खुद को ढ़ाँकती,
आँसुओं के चादर में लिपटी
ग्रीष्म, वर्षा, शीत के थपेड़ों से महफ़ूज़ रखती,
कभी उस सुबह के सपने सहेजती...............
.......... जो खुले आँखों से देखती,
एक व्यभिचारी की कैद में,
छटपटाती, तड़पती, गुहारती अपने बाबुल को,
दम तोड़ती उस सुबह की आस में,
रुसवाई के डर से भयभीत..............................

रात है कि खत्म होती नहीं,
दर्द है कि थमता नहीं,
साँस भी अब दम तोड़ रही
आत्मा भी पिंजर छोड़ रही
खुली आँखें अब हैं पथ पर लगी हुई,
आ जा कि अब रैन ढ़ली,
तेरे कदमों की आहट मिली कहीं
कि अब राह न भूल बटोही,
आ जा कि अंतिम है बेला,
आगोश में लेकर सुला दे मुझे चिर निद्रा में,
जी लूँ पल दो पल मेरे हमराज
कि शानों पे सिर रख कर तेरे
दम ले लूँ घड़ी दो घड़ी
उखड़ती साँसें है अब बेवफ़ाई पर आमादा,
आ जा हरजाई तू क्यों है खौफ़ज़दा,
दुनिया के रस्मो-रिवाज की जँजीरों में है जकड़ा,
तू न आ पायेगा आखिर,
कि रैन ढ़ली, ले चली मैं अब
फ़िर तलाश में उस रात की
जिस रात की सुबह नहीं,
शायद इस रात की सुबह नही
........ इस रात की सुबह नहीं।।

_____________ मौली