तुम्हारी खोज से क्लान्त हो आश्रय लिया जहाँ....... वो है विहँग नीड़
मंगलवार, 31 दिसंबर 2013
३५- मेरे रहनुमा हो तुम
तलाशती थी सदियों से जिसे,
मेरे ख्वाबों की वो ताबीर हो तुम
जर्रे-जर्रे पर उकेरती रही
जिस अक्स को वो हाला हो तुम।।
जन्म-जन्मान्तर की मेरी तपस्या के वरदान हो तुम
मेरी तिमिर ज़िन्दगी में आफ़ताब बन आये हो तुम।।
मेरे सूने मरुथल में आबसार बन आये हो तुम
किसी देवता के भेजे हुए कोई दूत हो तुम।।
मेरे रहबर, मेरे रहनुमा हो तुम
.................मेरे रहनुमा हो तुम।।
__ मौली
सोमवार, 30 दिसंबर 2013
मंगलवार, 24 दिसंबर 2013
३०- स्वर मेरे बिखर गये
सोचा न था यूँ बेरँग होगी मेरी शाम
तेरी जुस्तज़ू थी जमाने से
देख अक्सर आँखों का बेबाक तकाज़ा
दिल के हिलोरों को अक्सर रोका मैने
रचा था तुमने सप्तक प्यार का
आरोह तुम तो अवरोह मैं बनी
गीत के लिपिबद्ध होने से पहले
न जाने क्यों स्वर बिखर गये
तेरा अवरोह धूमिल हो गया
स्वर मेरे बिखर गये....।
स्वर मेरे बिखर गये.....।।
__ मौली
२८- ज़िन्दगी खफ़ा है मुझसे
फ़िसलती जा रही ज़िन्दगी मुठ्ठी से रेत की मानिन्द
कतरा-कतरा सा लहू भी ज़ज़्ब होता सा लगे
ज़िन्दगी खफ़ा है मुझसे आज न जाने क्यों
और तुम दिल लगाने की बात करते हो
डबडबाई-बुझती आँखों से मुस्कुराने की बात करते हो
मद्धिम होती बुझती साँस से लौ लगाने की बात करते हो
क्यों श्मशान से वापस आने की बात करते हो......
...... श्मशान से वापस आने की बात करते हो......।।
__ मौली
सोमवार, 23 दिसंबर 2013
गुरुवार, 19 दिसंबर 2013
सोमवार, 16 दिसंबर 2013
२१- आ बसा आँखों में कोई
गुमसुम सी बैठी मैं
किसी की यादों में खोई
आँखों से नींदें,
होठों से मुस्कान भी गुम है,
अचानक दिल में एक हूक सी उठी,
आत्मा रोई, हृदय चीत्कार उठा,
पर, आँख न जाने आज क्यों न रोई,
अचानक एक आँसू मेरी आँख से टपका,
मैंने पूछा, अरे तू क्यों बाहर छलक आया,
आँसू बोला, मैं कैसे रहूँ आँखों में,
वहाँ तो पहले से ही कोई और बसा है,
अब मेरी यहाँ क्या दरकार
अब न रहा मेरा इन आँखों से कोई सरोकार.....।।
__ मौली
शुक्रवार, 6 दिसंबर 2013
गुरुवार, 5 दिसंबर 2013
१४- हमसफ़र
ज़ुल्फ़ों को मेरी खुलकर
अपने शानों पे बिखर जाने दे
आँखों से छलकती हुई मय को
होठों से पी जाने दे
मेरी साँसों को
अपनी साँसों में समा जाने दे
तारों को आसमाँ पे बिखर जाने दे
मौसम को थोड़ा और बदल जाने दे
बादलों को गरज कर बरस जाने दे
तूफ़ाँ को आकर गुजर जाने दे
जब साथ हो तुम मेरे हमसफ़र
तो कश्ती को मौजों पे उतर जाने दे।।
__ मौली
१०- बिछड़न
फ़िर आज चाँद रात थी, दिल में था अँधेरा व्याप्त
हमारी निगाहें थीं प्यासी, कंवारी सी
आँगन में आये थे प्रियतम मुझसे मिलने तुम,
व्याकुल एहसास थे बाकी और रात थी थोड़ी सहमी।
हम मौन, बिछड़न की चादर बिछा बैठे थे
हरसिंगार भी टूट-टूट कर बिखेर रही थी खुश्बू
चहुँ ओर चाँदनी पेड़ों के झुरमुट से
लुका छिपी खेल रही थी हमसे,
कि आके बरबस बादल ने जकड़ा था आगोश में अपने।
लाज की बेड़ियाँ थी पाँव में मेरे और तुम भी थे
न जाने किन कसमों से बँधे-बँधे से।
यकायक सागर सम विशाल भुजायें फ़ैलाये तुम
आतुर थे आलिंगन बद्ध होने को,
मैं चँचल उफ़नती नदी सी
समाँ गई तुम्हारे अगाध प्रेम में।
कहीं दूर पिहू-पिहू करता पपीहा भी चिहुँक उठा
चाँद को न देख क्रन्दन करता चातक भी
आस छोड़ बैठा आज न जाने क्यों।
उखड़ती साँसों को सहेजती,
अश्रुपूरित निगाहों से विदाई की इस बेला में
इतना ही कह पाई जाते-जाते
कुछ तेरे सपने, कुछ मेरे सपने..........
कुछ तेरे सपने, कुछ मेरे सपने..........।।
__ मौली
सदस्यता लें
संदेश (Atom)



























