तुम्हारी खोज से क्लान्त हो आश्रय लिया जहाँ....... वो है विहँग नीड़

शनिवार, 30 अप्रैल 2016

कितने कच्चे थे न तेरे वो उम्मीद के धागे
नित टूटते हैं नित नये गाँठ पड़ते जा रहे।।
          मौली

मंगलवार, 26 अप्रैल 2016

नारी

नारी हूँ मैं
कोमलांगी हूँ
सह्रदय हूँ
जननी हूँ
भगिनी हूँ
भार्या हूँ
बेटी हूँ
देवी,धरित्री
प्रकृति भी हूँ
मोहपाश में
बन्धी हुई
कोमल ह्रदया
त्याग की मूर्ति
तो सहनशीलता
की पराकाष्ठा भी मैं
अनगिनत रूप मेरे
कितने ही
अलंकारों से
अलंकृत!!!
"नारी"
फिर भी अभिशापित
क्यों ??
मेरे बिन अपूर्ण
ये संसार...
फिर क्यों, क्यों
कन्या भ्रूण हत्या ?
क्यों क्रूर प्रपंच
कोख में अजन्मी
मेरे अस्तित्व को
निर्मूल करने की?
हा रे हंता..
          मौली

गुरुवार, 21 अप्रैल 2016

सहेज कर रक्खी
तुम्हारे यादों की
पोटली आज खोली
सोचा,कुछ अनमोल पल
चुन लूँ कुछ विसर्जित
कर दूँ......
अरे ! ये क्या ?
कुछ भी नही शेष बचा
तुम्हारी बेवफाई का दीमक
उन यादों को निर्मूल
कर गया...
आस की दवा भी
कब तक
हिफाज़त करती।।
मौली

बुधवार, 20 अप्रैल 2016

कितने फासले थे हम दोनों के दरमियां मगर......
    मोहब्बत की इन्तहां तो देखो ज़ज़्बात लावा बनकर भी ख़ामोशी से बहते रहे।।
          मौली

शनिवार, 16 अप्रैल 2016

बुत

बुत बन चुकी मेरी  ख्वाहिशों को जज़्बातों की आग से यूँ न दहकाओ
जो पिघलने लगी तेरे इश्क में सनम तो कहीं फिर न हों उम्मीदों की नुमाइशें।।
       मौली

सोमवार, 11 अप्रैल 2016

सूफियाना

मेरी इश्क की फकीरी भी क्या खूब रंग लायी है
के अब हर अंदाज़ देखो सूफियाना हो चला है।।
                     ।।मौली।।

शुक्रवार, 1 अप्रैल 2016

चलो आज थोडा रूमानी हो जायें

चाँद हो तश्तरी और तारे छप्पन भोग
आसमां बिछावन बन जाये
बादल  चादर बन जाये
चलो आज थोडा रूमानी हो जायें।।

सागर की लहरें झूला बन जायें
नदियां मेरी सखियाँ बन जायें
सम्पूर्ण प्रकृति माँ की गोद बन जाये
चलो आज थोडा रूमानी हो जायें।।

दिल नौनिहालों सा सरल बन जाये
पर्वत रथ और सूर्य सारथी बन जायें
पृथ्वी शतरंज,ग्रह उपग्रह मोहरें बन जायें
चलो आज थोडा रूमानी हो जाये।।
     मौली