तुम्हारी खोज से क्लान्त हो आश्रय लिया जहाँ....... वो है विहँग नीड़

सोमवार, 15 दिसंबर 2014

७०-





भूल जाइये या भूल जाने दीजिये
अब और न हमको तबाह कीजिये
वफ़ा न सही ज़फ़ा भी न दीजिये
अलविदा के वक्त तो दुआ कीजिये।।

__ मौली

६९-





किनारा दिखा कर मुझे मांझी ने लूटा
कश्ती भी छूटी और पतवार भी छूटा
इस ज़िन्दगी का ये फ़लसफ़ा है झूठा
सौदा था खरा मगर मुकद्दर था रूठा।।

__ मौली

६८-





बिछ्ड़न की चादर पे यादों की सलवटें सहेजती रह गई
पतझड़ की हवाएं शाखों से ही उजाड़ कर बिखर गईं।

__ मौली

शुक्रवार, 14 नवंबर 2014

६७-





बारिश की हर बूँद में तेरा अक्श नजर आया
तेरे साथ गुजारा हुआ हर मंजर याद आया।

__ मौली

६६-





ज़िन्दगी यूँ भी तो गुजर रही थी वीरानी में
आज तेरी कमी न जाने क्यों सताने लगी।

__ मौली

६५-





तमाम रात समेटा है आँखों में हमने
.......इक-इक लमहा इंतज़ार में तेरे।

__ मौली

रविवार, 9 नवंबर 2014

६४-





तेरी ज़फ़ा को भी नजरअंदाज किया हमने मगर
तुम तो उम्मीदों का दामन ही छुड़ा चले मुझसे।

__ मौली

६३-






तेरी हर सदा ने बहुत तड़पाया है हमें
तेरे हर आँसू ने बहुत रुलाया है हमें
तेरी हर कसक-दर्द का इल्म है मगर
रस्मों-रिवाज ने बहुत उलझाया है मुझे।।

__ मौली


शनिवार, 10 मई 2014

६२-





होठों. पर लगी. है. पाबन्दी. लफ़्ज़ों. की. तो. क्या
निगाहों. को इजहारे. मोहब्बत की इजाजत तो दे
कहाँ. तक. दफ़नायें. दिल. की आरजुओं. को हम
न मालूम मेरे प्यार की सहर कभी होगी कि नहीं।।

__ मौली

६१-





जिन्हे मुझसे दूर रहना कभी गवारा न था
वो ख्वाबों में आने से भी अब कतराते हैं।

__ मौली

६०-





संग तुम तो मेरा हर दिन मधुमास सा लगे
ओस की बूँद मे भी तेरा आभास सा लगे
तेरे बगैर चाँदनी भी अमावस सी लगे
स्वाती की हर बूँद भी सँत्रास सा लगे।।

__ मौली

५९-





न जाने वो क्यों अब मुझसे कतराने लगा
रस्मे मोहब्बत को वो अब झुठलाने लगा
टूटकर चाहा था जिसे हमने खुद से ज्यादा
वही आज मुझसे अपना दामन छुड़ाने लगा।।

-- मौली

५८-





तन्हाई में मेरे कोई शरीक न हुआ
रुसवाई में शामि शहर हुआ
उजड़ा जो देखा घर मेरा
जश्न मनाया लोगों ने।।

__ मौली

शनिवार, 22 फ़रवरी 2014

५७- दफ़न हो चुकी ख्वाहिशें फिर भी जिंदा हूँ





दफ़न हो चुकी उम्मीदें फ़िर भी जिन्दा हूँ,
कफ़न ओढ़े फ़िरती हूँ ज़िगर खराश,
हर गली हर शहर।

जहाँ रिश्तों की पाकीज़गी भी
शर्मसार होती शामों-पहर,
जहाँ कतरा-कतरा लहू बहता नारी की अस्मत का,
जहाँ घर की इज्जत से रौशन होती शान महफ़िलों की,
जहाँ बरपता कहर कन्या भ्रूण पर,
जहाँ दरिंदगी का वीभत्स मँजर देख कलपता हृदय,
जहाँ बुजुर्ग तिरस्कृत होते अपनी ही संतान से,
जहाँ संस्कृति दम तोडती वीभत्स मानसिकता तले,
जहाँ धर्म की डोर है अधर्मियों के सुपुर्द अब,
जहाँ देश के युवा शोषित और भ्रमित होते
नेताओं के मकड़जाल में,
जहाँ हमारे फ़ौजी शहीद होते
खौफ़नाक आतंकी मंसूबों तले,
जहाँ मानवता का हनन होता देख
क्रंदन करती धरती भी,
जहाँ धरित्री पर सजती रँगोली मासूमों के लहू से,
जहाँ रोती है आत्मा देख पतन देश का,
जहाँ दफ़न हो चुकी रोशनी और रँग स्याह कफ़न का,
जहाँ महफ़िलें अब बेरौनक हैं,
सभ्यता तोड़ती दम है,
मँदिरों और दरगाहों पे भी न मिलता
सुकून-ओ-अमन अब...........

सड़े-गले रिश्तों का लिबास होते देख तार-तार
फ़िरती हूँ ओढ़े ज़िगर खराश
दफ़न हो चुकी ख्वाहिशें~
फ़िर भी जिन्दा हूँ।
फ़िर भी जिन्दा हूँ।।

__ मौली

५६- न रहनुमा कोई






रुखसत होने से पहले हाले-दिल बताती चलूँ
बात दिल की, अब तक जो थी दिल में मेरे
जो जुबाँ पर आते-आते रुकती सी थी
सह कर वक्त की बेरहमी के थपेड़ों को
सहमा सा दिल था मेरा और बेबस थे लब मेरे।

बाबुल के बाग की एक कली थी मैं
जो बहारों में भी खिल न सकी
चाँदनी बन उतरी थी जिस आँगन में
ग्रहण से ग्रसित हो रोशिनी धूमिल हुई।

आरजू न बन सकी किसी के दिल की मैं
न जुस्तज़ू ही बन सकी किसी निगाह की मैं
तकदीर में लिखा था मैं जला करूँ बन कर शमा
बनकर आँसू आँखों से छलकी भी नहीं।

आँखों में झलकती थी प्यास
दिल में अरमान और बेबस आस
न आया हातिफ़ कोई लिये अमरत्व का प्याला
बावली थी मैं, सय्याद थे सब न रहनुमा कोई।
.......................सय्यद थे सब न रहनुमा कोई।।


__ मौली


हातिफ़ - देवदूत
सय्याद - शिकारी

५५- ऋतु बसन्त





एक साल बीत गया,
हवा के झोंकों के मानिन्द.......

नये उत्सव के आगमन में
प्रकृति में नया निखार है,
एक नशा, एक प्रेम की अभिव्यक्ति है,
बसन्त की इस आबो-हवा में इसे सहेज कर रखना,
सपनों को सत्य कर बहुत प्यार से रखना,
प्रेम के उद्गार को सुसज्जित कर
हम प्रेम की नयी रचना रचेंगें,
सृष्टि होगी एक नये प्रेम गीत की,
एक नये बन्धन के अलिंगनबद्ध दोनो
चलो उड़ चलें प्रेम पँख फ़ैलाये
मधुर से बसन्त ऋतु में.........
सिर्फ़ मैं और तुम.................
तुम और मैं.........................।।

__ मौली

शुक्रवार, 21 फ़रवरी 2014

५४-





कई फ़साने हैं इश्क के जुबाँ पे लोगों के मगर,
मेरे लब पे तेरे नाम के सिवा कुछ और नहीं
पूछा जो किसी ने मेरी इस उदासी का सबब,
छलके आँसुओं ने किया बयाँ तेरी बेवफ़ाई का।।

__ मौली

५३-





शब्द हैं अनन्त पर छँद रूठ गये
भँवरे पुष्प का मकरन्द लूट गये
राहे-जीस्त में मिले रहबर कई
कुछ साथ रहे कुछ पीछे छूट गये।।

__ मौली

गुरुवार, 20 फ़रवरी 2014

५२- हम देखा किये गुज़रते हुए काफिले का गुबार





उम्र गुजरी तमाम
खुद के गिरेबाँ में उलझते हुए....

आज मेरी ही परछाँईं मुझ पर
अजनबी होने का इल्जाम लगाती
और हर पल डराती सी है....

मुकद्दर में था कि हम देखा किये
गुजरते काफ़ीले का गुबार......

मँजिल भी थी सामने और रास्ता भी
मगर मुकाम पर
कभी तुम न थे
और कभी
हम न पहुँच सके।।

___________ मौली

बुधवार, 8 जनवरी 2014

५१-




तन्हाई थी जागी-जागी सी कल रात
माहौल था जागा-जागा सा कल रात
चाँद भी था खामोश-उदास-गुमसुम सा
शायद गम में मेरे था शामिल कल रात।।

__ मौली

५०- अधूरे से ख्वाब





कल हवा के तेज थपेड़ों नें पूछा मुझसे
रेत में तुम क्या लिखती हो अकेले में
बेजार सी तुम क्यों दिखती हो
किस सोंच में गुमसुम रहती हो
इंतजार यूँ तुम किसका करती हो?

मैंनें हँस कर कहा _________
न पूछ किस्से मेरी इस खामोशी के
पहले सी अब न रही मैं
न रहा दर्द कोई बाकी अब
कुछ अधूरे से ख्वाब थे मेरे
कुछ एहसान उनके हैं चुकाने।
कुछ एहसान उनके हैं चुकाने।।

__ मौली

४९-





मुद्दतों बाद पूछती मेरी ही परछाईं मुझसे
अजनबी सी लगती क्यों कह दो मुझसे
आँखें कह गईं वो जो दिल में न था मेरे
खामोशी कह गई दास्ताँ दिल की मुझसे।।

__ मौली

४८-





बेवफ़ाई की तोहमत मुझपे ही लगाते हो क्यों
सरेआम इजहारे-मोहब्बत से कतराते हो क्यों।

__ मौली

४६-





आवाज दूँ तुझकोये तावोतवाँ कहाँ मुझमे
आबिदा हूँ, खुद अपनी ही सदा से डरती हूँ।

__ मौली

सोमवार, 6 जनवरी 2014

४५-





हर चन्द हम उनके खयालों में खोए हैं
खुद को हम इश्क के सागर में डुबोए हैं।

__ मौली

४४-





जीवन जहर भरा सागर अब कब अमृत घोलेंगें
तनहाई में हम रो लेंगें पर तेरे भेद न खोलेंगें।।

__ मौली

४३-




मेरा माहताब बादलों से निकलने को है बेताब
सितारों से कह दो झुका लें सर को अदब से।।

__ मौली

४२-





शामो-सहर यूँ ही भीगते रहिये
मेरे कसीदों की बारिश में जनाब
मेरी मौसमे-आरजू को बेदर्दी से
आप यूँ तो न ठुकराइये जनाब।।

__ मौली

४१-





कभी चाँद चमका ग्रहण में घिर कर
कभी सूर्य निकला बादलों में छिपकर
वक्त गम का यूँ ही नहीं गुजर जाता
हम आप ही गुजर जाते हैं अक्सर।।

__ मौली

बुधवार, 1 जनवरी 2014

४०-





बारिश.. की. एक. रूमानी. शाम
पैगाम. प्रेम. सँग आये मेरे बाम
गिरह सारे खोल हृदय के श्याम
बँध. गई प्रिये, तेरे प्रेम के नाम।।

__ मौली

३९-





चाँदनी रात को तारों को जमीं पर उतरते देखा है
चाँद को भी बादल के आगोश में सिमटते देखा है
रिमझिम-रिमझिम गिरती बारिश की फ़ुहारों में
खुद को कान्हा के प्रेम में डूबते-निखरते देखा है।।

__ मौली

३८-






कुछ अधूरे ख्वाब जमाने में छोड़ आई थी
जरा सी बात पे दिल उनका तोड़ आई थी
जाने क्या गुजरी होगी उनपे, इल्म है मुझे
एक कसम पे उनकी हर रस्म तोड़ आई थी।।

__ मौली