तुम्हारी खोज से क्लान्त हो आश्रय लिया जहाँ....... वो है विहँग नीड़
शनिवार, 22 फ़रवरी 2014
५७- दफ़न हो चुकी ख्वाहिशें फिर भी जिंदा हूँ
दफ़न हो चुकी उम्मीदें फ़िर भी जिन्दा हूँ,
कफ़न ओढ़े फ़िरती हूँ ज़िगर खराश,
हर गली हर शहर।
जहाँ रिश्तों की पाकीज़गी भी
शर्मसार होती शामों-पहर,
जहाँ कतरा-कतरा लहू बहता नारी की अस्मत का,
जहाँ घर की इज्जत से रौशन होती शान महफ़िलों की,
जहाँ बरपता कहर कन्या भ्रूण पर,
जहाँ दरिंदगी का वीभत्स मँजर देख कलपता हृदय,
जहाँ बुजुर्ग तिरस्कृत होते अपनी ही संतान से,
जहाँ संस्कृति दम तोडती वीभत्स मानसिकता तले,
जहाँ धर्म की डोर है अधर्मियों के सुपुर्द अब,
जहाँ देश के युवा शोषित और भ्रमित होते
नेताओं के मकड़जाल में,
जहाँ हमारे फ़ौजी शहीद होते
खौफ़नाक आतंकी मंसूबों तले,
जहाँ मानवता का हनन होता देख
क्रंदन करती धरती भी,
जहाँ धरित्री पर सजती रँगोली मासूमों के लहू से,
जहाँ रोती है आत्मा देख पतन देश का,
जहाँ दफ़न हो चुकी रोशनी और रँग स्याह कफ़न का,
जहाँ महफ़िलें अब बेरौनक हैं,
सभ्यता तोड़ती दम है,
मँदिरों और दरगाहों पे भी न मिलता
सुकून-ओ-अमन अब...........
सड़े-गले रिश्तों का लिबास होते देख तार-तार
फ़िरती हूँ ओढ़े ज़िगर खराश
दफ़न हो चुकी ख्वाहिशें~
फ़िर भी जिन्दा हूँ।
फ़िर भी जिन्दा हूँ।।
__ मौली
५६- न रहनुमा कोई
रुखसत होने से पहले हाले-दिल बताती चलूँ
बात दिल की, अब तक जो थी दिल में मेरे
जो जुबाँ पर आते-आते रुकती सी थी
सह कर वक्त की बेरहमी के थपेड़ों को
सहमा सा दिल था मेरा और बेबस थे लब मेरे।
बाबुल के बाग की एक कली थी मैं
जो बहारों में भी खिल न सकी
चाँदनी बन उतरी थी जिस आँगन में
ग्रहण से ग्रसित हो रोशिनी धूमिल हुई।
आरजू न बन सकी किसी के दिल की मैं
न जुस्तज़ू ही बन सकी किसी निगाह की मैं
तकदीर में लिखा था मैं जला करूँ बन कर शमा
बनकर आँसू आँखों से छलकी भी नहीं।
आँखों में झलकती थी प्यास
दिल में अरमान और बेबस आस
न आया हातिफ़ कोई लिये अमरत्व का प्याला
बावली थी मैं, सय्याद थे सब न रहनुमा कोई।
.......................सय्यद थे सब न रहनुमा कोई।।
__ मौली
हातिफ़ - देवदूत
सय्याद - शिकारी
५५- ऋतु बसन्त
एक साल बीत गया,
हवा के झोंकों के मानिन्द.......
नये उत्सव के आगमन में
प्रकृति में नया निखार है,
एक नशा, एक प्रेम की अभिव्यक्ति है,
बसन्त की इस आबो-हवा में इसे सहेज कर रखना,
सपनों को सत्य कर बहुत प्यार से रखना,
प्रेम के उद्गार को सुसज्जित कर
हम प्रेम की नयी रचना रचेंगें,
सृष्टि होगी एक नये प्रेम गीत की,
एक नये बन्धन के अलिंगनबद्ध दोनो
चलो उड़ चलें प्रेम पँख फ़ैलाये
मधुर से बसन्त ऋतु में.........
सिर्फ़ मैं और तुम.................
तुम और मैं.........................।।
__ मौली
गुरुवार, 20 फ़रवरी 2014
बुधवार, 8 जनवरी 2014
५०- अधूरे से ख्वाब
कल हवा के तेज थपेड़ों नें पूछा मुझसे
रेत में तुम क्या लिखती हो अकेले में
बेजार सी तुम क्यों दिखती हो
किस सोंच में गुमसुम रहती हो
इंतजार यूँ तुम किसका करती हो?
मैंनें हँस कर कहा _________
न पूछ किस्से मेरी इस खामोशी के
पहले सी अब न रही मैं
न रहा दर्द कोई बाकी अब
कुछ अधूरे से ख्वाब थे मेरे
कुछ एहसान उनके हैं चुकाने।
कुछ एहसान उनके हैं चुकाने।।
__ मौली
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