दफ़न हो चुकी उम्मीदें फ़िर भी जिन्दा हूँ,
कफ़न ओढ़े फ़िरती हूँ ज़िगर खराश,
हर गली हर शहर।
जहाँ रिश्तों की पाकीज़गी भी
शर्मसार होती शामों-पहर,
जहाँ कतरा-कतरा लहू बहता नारी की अस्मत का,
जहाँ घर की इज्जत से रौशन होती शान महफ़िलों की,
जहाँ बरपता कहर कन्या भ्रूण पर,
जहाँ दरिंदगी का वीभत्स मँजर देख कलपता हृदय,
जहाँ बुजुर्ग तिरस्कृत होते अपनी ही संतान से,
जहाँ संस्कृति दम तोडती वीभत्स मानसिकता तले,
जहाँ धर्म की डोर है अधर्मियों के सुपुर्द अब,
जहाँ देश के युवा शोषित और भ्रमित होते
नेताओं के मकड़जाल में,
जहाँ हमारे फ़ौजी शहीद होते
खौफ़नाक आतंकी मंसूबों तले,
जहाँ मानवता का हनन होता देख
क्रंदन करती धरती भी,
जहाँ धरित्री पर सजती रँगोली मासूमों के लहू से,
जहाँ रोती है आत्मा देख पतन देश का,
जहाँ दफ़न हो चुकी रोशनी और रँग स्याह कफ़न का,
जहाँ महफ़िलें अब बेरौनक हैं,
सभ्यता तोड़ती दम है,
मँदिरों और दरगाहों पे भी न मिलता
सुकून-ओ-अमन अब...........
सड़े-गले रिश्तों का लिबास होते देख तार-तार
फ़िरती हूँ ओढ़े ज़िगर खराश
दफ़न हो चुकी ख्वाहिशें~
फ़िर भी जिन्दा हूँ।
फ़िर भी जिन्दा हूँ।।
__ मौली

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें