तुम्हारी खोज से क्लान्त हो आश्रय लिया जहाँ....... वो है विहँग नीड़

शनिवार, 22 फ़रवरी 2014

५६- न रहनुमा कोई






रुखसत होने से पहले हाले-दिल बताती चलूँ
बात दिल की, अब तक जो थी दिल में मेरे
जो जुबाँ पर आते-आते रुकती सी थी
सह कर वक्त की बेरहमी के थपेड़ों को
सहमा सा दिल था मेरा और बेबस थे लब मेरे।

बाबुल के बाग की एक कली थी मैं
जो बहारों में भी खिल न सकी
चाँदनी बन उतरी थी जिस आँगन में
ग्रहण से ग्रसित हो रोशिनी धूमिल हुई।

आरजू न बन सकी किसी के दिल की मैं
न जुस्तज़ू ही बन सकी किसी निगाह की मैं
तकदीर में लिखा था मैं जला करूँ बन कर शमा
बनकर आँसू आँखों से छलकी भी नहीं।

आँखों में झलकती थी प्यास
दिल में अरमान और बेबस आस
न आया हातिफ़ कोई लिये अमरत्व का प्याला
बावली थी मैं, सय्याद थे सब न रहनुमा कोई।
.......................सय्यद थे सब न रहनुमा कोई।।


__ मौली


हातिफ़ - देवदूत
सय्याद - शिकारी

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