तुम्हारी खोज से क्लान्त हो आश्रय लिया जहाँ....... वो है विहँग नीड़

गुरुवार, 20 फ़रवरी 2014

५२- हम देखा किये गुज़रते हुए काफिले का गुबार





उम्र गुजरी तमाम
खुद के गिरेबाँ में उलझते हुए....

आज मेरी ही परछाँईं मुझ पर
अजनबी होने का इल्जाम लगाती
और हर पल डराती सी है....

मुकद्दर में था कि हम देखा किये
गुजरते काफ़ीले का गुबार......

मँजिल भी थी सामने और रास्ता भी
मगर मुकाम पर
कभी तुम न थे
और कभी
हम न पहुँच सके।।

___________ मौली

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