तुम्हारी खोज से क्लान्त हो आश्रय लिया जहाँ....... वो है विहँग नीड़

गुरुवार, 21 नवंबर 2013

९- विरह





विरह में तेरे मितवा तरफ़त हूँ दिन-रैन
दूर मोसे जा बसे कौन से देस
गुहारत रहूँ तोहे हर पल
तुझ बिन सूना जग सारा।।

निस-दिन राह तकूँ मैं तोरी
अब न हिय जलाओ
जो हो मोसे प्रीत साँची
सो मोहे अब आन मिलो।।

कदम्ब की छाँव, जमुना का तट
सब है सून पिया तोरे बिन
निष्ठुर बन क्यों तज गये मोहे
तुम तो जानों हिय की पीर
निर्मोही सही न जाये हृदय की व्यथा
गरवा लगा मोहे ले चल जमुना के तीर।।

__ मौली

८- प्रतीक्षा





हर पल राह देखूँ वहाँ तक
दूर जहाँ से राह मुड़ी है
मैं समझी प्रियतम तुम आये
जब-जब राह में धूल उड़ी है
पर वो तुम न थे
गुबार ही था धूल का
तकदीर न जाने क्यों
रँग बदल-बदल कर
मुझसे छल कर जाये
आशा भी न जाने क्यों
विश्वास जगा कर
मुझसे छल कर जाये... ।।

__ मौली

बुधवार, 20 नवंबर 2013

७- समर्पण





व्याकुल अवसाद से घिर रात में,
कोसों दूर नींद से,
किसी के विरह से व्यथित हृदय
और सलवटें चादर की
बयाँ करती मेरी दास्तान,
अन्तहीन रात के वो भयावह पल
इन्तजार में भोर की पहली बेला का।

पिय मिलन के प्यासे नैन,
चँचल, शोख, उफ़नाती नदी के मानिन्द,
अपने सागर से एकाकार होने को आतुर,
अपने प्रेम के उद्गार से ओतप्रोत
सारे बन्धन तोड़,
आज विशाल, विहँगम सागर में समाहित होने।

अपनी असीमित गहराइयों को छोड़
भुजायें फ़ैलाये
हुँकार की गर्जनाओं से गुँजायमान,
लालायित है,
अपनी नदी को, अपने में जज्ब करने।

अगाध प्रेम की डोर से बँध कर
दो प्रेमी आज एक दूसरे में समा गये,
मानों अधूरे थे वे, एक-दूजे के बिन
मर्यादा में बँधे, जन्मों से बिछुडे
रिक्त स्थानों को पूर्ण करते
नदी सागर की बाहों में समा गई।

मिलन के अद्भुत शुभ मुहुर्त में
आकाश भी आनन्दित हो
जल-बूँद रूपी पुष्प अर्पित करने लगा।

बादलों और विद्युज्ज्वाला ने
कौंध कर मिलन की बेला को
प्रकाशमय,
और गरज कर
अपनी शहनाई की धुन से मुखरित किया
और
सम्पूर्ण सृष्टि, सुगन्ध से सुवासित दिशाओं
तथा भोर के अलौकिक मिलन मे
इस अलौकिक प्रेम महाकाव्य की रचना हुई.....।।

__ मौली

६- रात मेरी यूँ सँगीन....





यादों को आने से कौन रोक पाया भला,
कदम उस तरफ़ मुड़ते हैं आज भी,
जिधर उनके कदमों की आहट थी कभी,
हर दस्तक अब भी चौंकाती है मुझे,
सहर न होगी रँगीन फ़िर कभी,
दिल भी है गमगीन........
रात मेरी यूँ सँगीन.........।
रात मेरी यूँ सँगीन..........।।

__ मौली

शनिवार, 16 नवंबर 2013

५- मेरा वजूद





तनहा चले थे जिन राहों पे,
उन गलियों से लगता है अब डर,
किससे कहें चलो साथ मेरे कुछ दूर,
सब तो काफ़िले में हैं मशगूल,
गुबार धूल का पूछता मुझसे मेरा वजूद,
हँस कर बोली मैं..........
तलाश में हूँ जमाने से
कहाँ है............
"मेरा वजूद"...............।।

__ मौली

शुक्रवार, 15 नवंबर 2013

४- कलम की व्यथा





आज मेरी कलम ने भी धमकी दी,
मेरा साथ छोड़ने की,
मैं अवाक, हतप्रभ सी कलम को देखती रह गयी,
मैंनें प्रश्नवाचक नजरों से कलम को देखा, तो
कलम ने कहा --
क्या तुम विदित हो अपने ऊपर होते अत्याचार से,
तुम्हे आभास नहीं अपने बिगड़ते सम्बन्धो का,
मेरे-तेरे के मध्य रिश्तों ने तुझे हताहत किया,
मूढ़मति और मूक-बधिर बन देखती रही इसे,
इस तू-तू, मैं-मैं के मंजर से
हृदय विदीर्ण हुआ,
आत्मा अतिंम साँसे लेने लगी,
आँखों से अविरल अश्रुधार बह निकली।

यहाँ तक फ़िर भी ठीक था ---
जब तक तेरे होठों से
एक आह और सिसकी भी न निकली।

तुझमें होगा धैर्य, संयम, प्रेम, सद्भावना,
पर मैं..?
मुझे तो तूने प्रेम, विरह,
देशप्रेम रिश्तों की मधुरता को
व्यक्त करने का जरिया बनाया था,
मैंने न जाना कोई दूसरा दर्द
तेरी पीड़ा से भी अनजान न थी मैं
पर आज मैनें बगावत की है,
रिश्तों ने घायल किया है
तेरी आत्मा और लेखनी को
तेरी सरलता और सहजता को
उन छलावे रिश्तों को
अब न अपनाने दूँगीं तुझे
बस, बहुत हो चुका
उठ, आज रच एक नई रचना
"नारी है संयम, धैर्य और प्रेम का संगम,
नारी है जननी, नारी है शक्ति, नारी है ममत्व का प्रतीक,"
सम्मान नहीं है नारी का
जिस धरती, देश और समाज और घर में
विनाश ही विनाश है वहाँ
नहीं है वास देवताओं का भी वहाँ।।

__ मौली