तुम्हारी खोज से क्लान्त हो आश्रय लिया जहाँ....... वो है विहँग नीड़

बुधवार, 10 अगस्त 2016

वक्त

इक घड़ी क्या खरीद  ली हमने
वक्त तो मेरे पीछे ही पड़ गया।।
    मौली

मंगलवार, 9 अगस्त 2016

रुसवाईयाँ

रुसवाईयाँ

सच ज़िन्दगी की पीछे चलती रही पांव पांव
रुसवाईयाँ मेरे नसीब की आगे दौड़ती रही।।
             मौली

रविवार, 7 अगस्त 2016

जीवन पथ

पथरीले जीवन पथ पर चलते क्लांत रक्तरंजित पांव को दुलराया किसने क्या माँ आज भी अपनी ममता का आँचल बिछाये बैठी है राहों में मेरे।। मौली

गुरुवार, 4 अगस्त 2016

हाईवे का खौफ

हाईवे नाममात्र से ह्रदय वेदना और भय से कांप उठा।हाईवे इक रास्ता गन्तव्य तक पहुंचने का परंतु इस "हाईवे"नामक कृत्य ने जीवन के सारे रास्ते अवरुद्ध कर दिये।सारे उमंग सारे सपने ही नही समस्त रिश्तों को भी रौंद डाला उस भयावह काली रात ने। कौन सा नियम कौन सा कानून कौन सा आश्वासन उस हादसे को पाटेगा? कौन सा हस्ताक्षर दरिंदो को खौफनाक दंड देगा? जिससे पीड़ित परिवार को वो सब मिल जायेगा जो उस रात खोया? कितनी निर्भया कब तक मरती रहेंगी सहती रहेंगी पाश्विक अत्याचार? क्यों नही कोई कानून कोई नियम इन दरिंदों के लिये बना जिसके नाम मात्र से इनकी रूह कांप उठे और जघन्य कृत्य करने से पहले करोड़ों बार सोचे। नही साहब ऐसा कोई कानून ही नही बना अब तक हमारे देश में जिससे व्यभिचारी दण्डित हो।आरोपी बेख़ौफ़ घूमें और निर्दोष बलि चढ़े। युगों से हमारे देश में देवियां पूजी जाती है बड़े आयोजन और ढोंग होते हैं देवी पूजन का। नवरात्रि में वो घण्टे घड़ियाल,शंख,पुष्प और धूप दीप,मिष्ठानों से माँ का आह्वान और पूजा अर्चना की जाती है।बड़ी निष्ठा और भक्ति दिखाई जाती है और उसी नारी रूप को नाना प्रकार से अत्याचार किया जाता है,शोषण किया जाता है। जिस पत्थर की देवी को माँ माँ करता सिर पटकता नाक घिसता मंदिरों में,उसी माँ को गाली देते उसकी कोख को कलंकित करने और उसी देवी स्वरूपा बहु, बेटियों से पाश्विक कृत्य करने से बाज नही आता। अति तो देखिये माताओं को भी नही बख्शते। बेटियों,पत्नियों,माओं, बहनों और समस्त नारियों के लिये इतने कानून इतने रिवाज़ इतनी मर्यादायें बनी पर पुरुषों के लिये क्यों नही कोई कानून बना?? क्यों उनको इस दर्द का तनिक आभास नही होता या उन्हें अहसास कराया जाता,क्यों नही उनकी आज़ादी पे कोई प्रतिबन्ध लगता,क्यों कोई सीमायें और मर्यादायें उनपे लागू नही होती ?? क्यों आखिर क्यों? हर माँ अब बेटी को जन्म देने से पहले हज़ार बार सोचेगी,डरेगी,सहमेगी फिर शायद उसके भयावह भविष्य और वर्तमान को सोचकर आतंक से कोख में ही उसे मार देगी। जन्म दायिनी ही दिल पे पत्थर रख हंता बन अजन्मी बेटी का अंत कर देगी,कारण जन्मते ही तो वो हवस का शिकार बनेगी,समस्त रिश्ते शर्मशार होंगे,सभी रिश्तों को संदेह और भय से देखेगी।भाई, पिता,पति को भी संदेह से देखेगी,सहेगी अत्याचार तन मन का ,देगी बलिदान उम्र सारी और बदले में पायेगी दर्द,घृणा,अनादर,कुंठा,ग्लानि। शोषित होगी या एसिड से दग्ध की जायेगी या अग्नि से जलाई जायेगी या आत्महत्या करने पर मजबूर की जायेगी। पिता,पुत्र,भाई,पति आदि सभी रिश्तों के सामने या पीछे ये घृणित कृत्य होते हैं तब उनकी दशा कैसी होती होगी ? क्या वो अपने को असहाय नही पाते होंगे जब उन्ही की बहन बेटी उनकी ओर सवालिया दृष्टि से देख पूछेगी कि मेरा कसूर क्या था ? क्यों ये असहनीय शारीरिक और मानसिक अत्याचार हमे सहनी पड़ रही ? क्या कोई जवाब दे पाएंगे वे ? कितनी सभायें कितनी गोष्ठियां कितने ही राजनितिक प्रवचन हो। कितने ही झूठे आश्वासन दे लें वो, लचर कानून, प्रशासन और भ्रष्ट नेताओं के चलते यहाँ कुछ भी नही हो सकता । जब तक यहाँ की कानून व्यवस्था सशक्त नही होगी हर आरोपी को चाहे वो कोई भी तमगे या किसी स्तर का हो या हो भ्रष्टाचारी,बलात्कारी या आतंकी सभी को कठोर से कठोर दंड नही देंगे तब तक इन सब का विनाश और अंत नही होगा । बहुत हो चुका परपंच और धैर्य, अब होगी आरपार की लड़ाई वर्ना वो दिन दूर नही जब कांप उठेगी धरित्री और प्रलय से होगा विनाश। खौफ तले अब नही जियेगी कोई मासूम न ही किसी दुस्साशन को चीरहरण करने देगी।अब कानून को आँखे खोलनी होगी बहुत रह लिया कानून अंधा, प्रशासन को चुस्त दुरुस्त करना ही होगा। बहुत हो गये खेल तमाशे और बहुत सह चुकी नारी बनाम देवी।
       मौली चक्रवर्ती

बुधवार, 3 अगस्त 2016

सुनसान हाइवे

सुनसान हाईवे
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फर्राटे भरती गाड़ियों के
शोर में
खौफनाक घटना घटती रही
शासन दुस्साशन बना रहा
अस्मत तार तार होती रही
नारी शर्मशार होती रही
मानवता ज़ार ज़ार रोती रही
सुनसान हाईवे जश्न मनाता रहा

न ज़िन्दगी का कोई मोल रहा
न बची रिश्तों की कोई मर्यादा
क्रूरता और हैवानियत पुरज़ोर रहा
भीड़ में भी इंसान तन्हा रहा
सुनसान हाईवे जश्न मनाता रहा

अँधा कानून मूक बधिर बना रहा
राजनीति का तमाशा भी खूब रहा
चुनावी बाजार में नेताओं की सरगर्मियां पुरज़ोर रही
फरियादी की गुहार संसद के कोलाहल में दबता रहा
सुनसान हाईवे जश्न मनाता रहा

ज़िंदा लाशों को झूठे तसल्ली का कफ़न ओढ़ाते रहे
बेख़ौफ़ दरिंदे अगला शिकार तलाशते रहे
कुम्भ करण सा प्रशासन सोता रहा
नेता विरोधी दलों पे आरोपी रोटियां सेंकते रहे
सुनसान हाईवे जश्न मनाता रहा

कानून के रखवाले लिये बैशाखी नींद में सरपट दौड़ते रहे
दम तोड़ती सच्चाई पैदल चलती रही
देख ये खूंखार मंज़र धरित्री क्रंदन करती रही
सुनसान हाईवे अब काला इतिहास रचता रहेगा
सुनसान हाईवे मातम का जश्न मनाता रहेगा।।
               मौली

दरकते रिश्ते

दरकते रिश्तों की बर्फ पिघलने लगी
शायद अब भी कही आग बाकि है।।
    मौली

मंगलवार, 2 अगस्त 2016

कैसे भुला तू मुझे

तू मुझको कैसे भुला
मैं तो तुझमे ही हूँ
तू मुझमे है समाया
हर गीत संग गुनगुनाया
हर बोल तुझसे ही शुरू
हर सुर में तेरा ही सरगम
फिर तू मुझको कैसे भुला

तेरे संग जागी तेरे संग सोई
तू रहा भूखा जब जब
मैंने भी तोड़ा न एक भी निवाला
प्यासा रहा जो तू कभी
गला शुष्क हुआ मेरा
फिर कैसे भुला तू  मुझे

दिल जो दुखा तेरा तो आँखे मेरी रोई ज़ार ज़ार
चोट जो लगी तुझे कभी
मर्माहत हुई मैं
आँखे जो झपकी तेरी
सपने देखे आँखों ने मेरे
फिर कैसे भुला तू मुझे

आहट जो हुई कहीं घर
पे तेरे
तो अक्सर मैं चौंकी घबराकर
दरवाज़ा शायद खटका मेरा
जब कभी थका मांदा तू है आया
बदहवास सी मैं भागी अक्सर
न तू ही आया न तेरा पैगाम
फिर कैसे भुला तू मुझे

ज़मीं से आसमां पे बिठाकर
मुझे कहाँ चला और क्यों
तू मुझे यूँ तन्हा छोड़कर?
हाथ थामकर चलना सिखाकर
हाथ झटक कर कहाँ चले
मेरी हर शिकन पे विचलित
हो उठते थे तुमतो
फिर आज मेरे बिलखने
पर भी क्यों न रुके
अपना बनाकर मुझे आज
क्यों पराया कर चले सनम
फिर कैसे आज भुला तू मुझे

चिता तक के सफर तक
तो रुक जाओ
सुहागन का श्रृंगार तो पूरा करते जाओ
हाथों से मुझे लाल चुनर
तो ओढ़ाते जाओ
अगले जन्म में मेरे होगे
ये वादा तो पूरी करते जाओ
के पुकार लूँ आखिरी दफा
सनम ओ मेरे सनम
कैसे भूला तू  मुझे।।
    मौली