तुम्हारी खोज से क्लान्त हो आश्रय लिया जहाँ....... वो है विहँग नीड़

बुधवार, 13 जून 2018

अंतहीन संवाद

अंतहीन संवाद
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विछोह की वह रात थी

हम बैठे थे मौन,लिये

अतीत की पोटली

ठिठुरती सी सर्दी थी

बहकते से थे जज़्बात

दो जिस्मों का अलाव जला,

हम तापते रहे एक उम्र

अश्रुओं की बारिश में

थरथराते रहे होंठ

बेबसी की गिरह को

खोलने की अगाध चेष्टा

उन्माद की आंधी में

ढहा जर्जर तनमन

धैर्य का एक जुगनू

बना आस का दीप

कसमों की डोर से

एक दूजे को बांधे

असाध्य बिछड़न की
पीड़ा

और अंतहीन संवाद
                     मौली

पाखी

अभी लिखी एक नज़्म....
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हम दो पाखी एक डाल के

उड़ना चाहे पर उड़ न सके

भाव है बहुत पर शब्द नही

कश्ती तो है पर साहिल नही

बात हिया की होंठों दबी है

पिय बिन अब तो जी न लगे

रात है लम्बी सुबह न आई

बिरहा की तपिश में जलजल जाऊं

कैसे उन्हें मैं भेजूं हाल जिया की

समझे न वो मेरे दिल की अगन को

तपती सांस है होंठ ख़ुश्क हैं

सहमी नब्ज़ है आंख है बोझिल

सुन लो सजन मेरी बेदम धड़कन

सांझ ढले तक आ जाओ तुम......

सांझ ढले तक आ जाओ तुम.....
            मौली