अंतहीन संवाद
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विछोह की वह रात थी
हम बैठे थे मौन,लिये
अतीत की पोटली
ठिठुरती सी सर्दी थी
बहकते से थे जज़्बात
दो जिस्मों का अलाव जला,
हम तापते रहे एक उम्र
अश्रुओं की बारिश में
थरथराते रहे होंठ
बेबसी की गिरह को
खोलने की अगाध चेष्टा
उन्माद की आंधी में
ढहा जर्जर तनमन
धैर्य का एक जुगनू
बना आस का दीप
कसमों की डोर से
एक दूजे को बांधे
असाध्य बिछड़न की
पीड़ा
और अंतहीन संवाद
मौली