तुम्हारी खोज से क्लान्त हो आश्रय लिया जहाँ....... वो है विहँग नीड़

शुक्रवार, 23 दिसंबर 2016

इसतरह से हमें वो भुलाने लगे। ख़ाक अपनी हवा में उड़ाने लगे। * हमने यूँ ही उन्हें बेवफ़ा जो कहा, आसमाँ अपने सर पे उठाने लगे। * नैन से नैन थोड़े मिले थे कि बस, आईने रोशनी को चिढ़ाने लगे। * आरज़ू जुस्तजू ख़्वाहिशें हसरतें स्वप्न नैनों में कुछ चहचहाने लगे। * आँधियाँ बारिशें बिजलियाँ आगयीं आशियाँ प्यार का जब बनाने लगे। * होंट पलकों पे उसने रक्खे जिस घडी, अक्स माजी के सब थरथराने लगे। * बेख्याली में झटकी जो जुल्फें ज़रा, सारे मौसम मुझे गुनगुनाने लगे। * 'मौली' जन्मों के तप का सिला ये मिला, बस मिले और फिर आज़माने लगे।

गुरुवार, 15 दिसंबर 2016

कागज़ का दर्द

कागज़ के दर्द का इल्म किसे यहाँ,सभी रहे मशगूल कलम घिसने में  बोझिल हुई किताबें बेदर्द हर्फ़ों से,मगर दिल न हुआ ख़ाली अबतक दर्द से।।               मौली

चाहत

मौसमों में चाहतों के रंग भरना चाहिये।
कुछ न कुछ ख़ामोशियों के दिल धड़कना चाहिये।

मेरा दिल कबतक हथेली पर मेरी तन्हा रहे,
तुझको भी तो जिस्म से बाहर निकलना चाहिए।

कैसे मानूं प्यार के इस खेल में माहिर है तू,
आँसुओं के ज़ख़्म से बिछड़न उबलना चाहिए।

रुसवाईयाँ,तन्हाईयाँ,दर्द,आहें और तड़प,
ऐसे मौसम में मुझे अब खुलके हँसना चाहिए।

सिसकियाँ तन्हाईयाँ रुस्वाईयाँ आहें तड़प,
ऐसे मौसम में मुझे कुछ खुलके हँसना चाहिए।

आज़माइश साज़िशें हैं मैं हूँ और क़िस्मत मिरी,
सोचती हूँ किसकी आँखों को छलकना चाहिए।
      मौली

बुधवार, 14 दिसंबर 2016

माज़ी

तुमने माज़ी के खुश्क शाखों को तोड़ दिया
लो हमने भी आँखों से सूखी नमी  गिरा दी।।
          मौली

मंगलवार, 13 दिसंबर 2016

दर्द

रुसवाइयों का मेला है दर्द भी अनोखा है
मुझको अब ये ज़िद है के डूबके उबरना है।।
           मौली

ज़िस्म को क्या मेरी रूह को न छू पायेगा मेरी पाकीज़गी की आंच में झुलस जायेगा बंदगी की एक रस्म तो अदा कर कभी ज़र्रे ज़र्रे में मुझको हरपल पायेगा।। मौली

सोमवार, 12 दिसंबर 2016

ज़िन्दगी

साया कब तन से जुदा हो पाया है मियां
कितनी ही क्यों न आंधियां पुरज़ोर रही हों।।
                  मौली

शनिवार, 10 दिसंबर 2016

अधूरे सपने

कैसी चाँद रात थी दिल पर अँधियारे गहराये थे। रातों की धडकन को जब भी गिनती सहमी साँसों से, बिछडन की चादर फैलाकर मौन अधर बैठाये थे । ऐसे में ही मेरे प्रियतम मुझसे मिलने आये थे। आतुर व्याकुल प्यास रखी थी क्वाँरे क्वाँरे नैनों में, रातों ने तेरी यादों के मौसम जब दहकाये थे। पेडों की झुरमुट से चंदा लुकाछुपी जब खेला था, टूटके हरसिंगार ने साये ख़ुशबू के बिखराये थे। पग में लाज की जंजीरें थी सामने थे प्रियतम तुम भी, क़समों वादों के बादल फिर आँखों में बौराये थे। अन्तस् की चंचल सरिता फिर आलिंगन को मचल उठी, सागर जैसे अपने बाज़ू तुमने जब फैलाये थे। पिहू पिहू में पीर सुलगती चातक क्रंदन करता था, आशाओं के सारे पलछिन साँसों ने बिसराये थे। मौली आधे रहे अधूरे सपने कुछ तेरे कुछ मेरे भी, नयन विदाई की बेला में "मौली" ये कह पाये थे।

शुक्रवार, 9 दिसंबर 2016

रात

सन्नाटों की धूल उड़ती है कहीं काली गहन रातों में तो कहीं यादों के अलाव जलते हैं सर्द रातों में।। २३.११.२०१६ मौली

रविवार, 4 दिसंबर 2016

वक्त की ये साजिश थी या के मेरी किस्मत
सब्र के पैमाने को  अभी और  छलकना है।।
           मौली

शुक्रवार, 25 नवंबर 2016

हिज़्र

आकर दबे पांव शब यूँ चली जाती है रोज़
पसरे हुए सन्नाटों में सिर्फ सुना जाती है सोज़
कभी तुम भी तो नींद से उठकर देखो ज़रा
हिज्र की तन्हा रातों के मंज़रों का ओज़।।
       २५.११.२०१६
मौली

मंगलवार, 22 नवंबर 2016

अहसास

बासी लकीरों को हाथ से गिरा दी मैंने,तुम भी तो
रिश्तों पे जमी बर्फ को अहसास की आंच दे दो।
          मौली

रविवार, 20 नवंबर 2016

नैन से नैन थोड़े मिले थे कि बस,
आईने रोशनी को चिढ़ाने लगे।
           मौली

शुक्रवार, 11 नवंबर 2016

रंगरेज

रंगरेज ने मेरे....नया रंग बुना है
मुझपे आज कैसा ये रंग खिला है।।
           मौली

हसरत

हसरत की हथेली पे ...दो पल मेरे रख दो
इक लम्हा मोहब्बत का सिरहाने ज़रा रख दो
            मौली

रविवार, 6 नवंबर 2016

हाला

चंद्रमा के हाला सा जो बांहों का तेरे घेरा है इसमें ही बिखर मुझको इसमें ही सिमटना है।।
   मौली

शनिवार, 5 नवंबर 2016

रहगुज़र-ए-दिल

वक़्त के शमियाने तले क्या क्या फ़साने बने
कुछ रहगुज़र-ए-दिल तो कुछ दास्ताँ बने।।
  मौली

गुरुवार, 3 नवंबर 2016

अधूरे सपने

कैसी चाँद रात थी दिल पर अँधियारे गहराये थे।

रातों की धडकन को जब भी गिनती सहमी साँसों से,

बिछडन की चादर फैलाकर मौन अधर बैठाये थे ।

ऐसे में ही मेरे प्रियतम मुझसे मिलने आये थे।

आतुर व्याकुल प्यास रखी थी क्वाँरे क्वाँरे नैनों में,
रातों ने तेरी यादों के मौसम जब दहकाये थे।

पेडों की झुरमुट से चंदा लुकाछुपी जब खेला था,

टूटके हरसिंगार ने साये ख़ुशबू के बिखराये थे।

पग में लाज की जंजीरें थी सामने थे प्रियतम तुम भी,
क़समों वादों के बादल फिर आँखों में बौराये थे।

अन्तस् की चंचल सरिता फिर आलिंगन को मचल उठी,

सागर जैसे अपने बाज़ू तुमने जब फैलाये थे।

पिहू पिहू में पीर सुलगती चातक क्रंदन करता था,

आशाओं के सारे पलछिन साँसों ने बिसराये थे।

आधे रहे अधूरे सपने कुछ तेरे कुछ मेरे भी,

नयन विदाई की बेला में "मौली" ये कह पाये थे।

बुधवार, 2 नवंबर 2016

कोरा मन

इंद्रधनुष के रंगों से कोरा मन भिगोया था
रात की स्याही ने उसपे भी डेरा डाला था।।
              मौली

सोमवार, 17 अक्टूबर 2016

खार

दास्ताँ

लिखने को बहुत कुछ है मगर
शब्द उतरे अब बगावत पर
इक इक लफ्ज़ तड़पता रहा
दास्ताँ अपनी अपनी सुनाकर।।
                मौली

मंगलवार, 20 सितंबर 2016

रौशनी को बेड़ियों में यूँ तो  न जकड़ो
अमावस को इसका इंतज़ार आज भी है।
    ।।मौली।।

शुक्रवार, 16 सितंबर 2016

नयन में नीर है तो क्या मगर हम मुस्कुरायेंगे।

ह्रदय की पीर अधरों पर सजाकर गुनगुनायेंगे।

वो जिन रातों ने रेज़ा रेज़ा सारे ख़्वाब तोड़े थे,

उन्हीं रातों से हम अपना सवेरा छीन लायेंगे।
     । ।मौली।।

मंगलवार, 13 सितंबर 2016

बुत

ज़रा तो ठहरो...                                                    फ़ेर के निगाहें जाने वाले...
भ्रम के मायाजाल से निकलने तो दो.....
रिश्ते के ढाई आखर को सहेजने तो दे
पन्नें, मेरे भरोसे के बटोरने तो दे.....  
चले जाना के पलकों के कतारों को भींग जाने तो दे.....                                                    सिरहाने रख दूँ दुआएं ये मोहलत तो दे....
फरेब की सिलवटों को जी भरके फिर देखने तो दे.....
जा ...के अब न मिलूंगी फिर दोबारा कभी
मुझे बुत में ज़रा तब्दील होने तो दे......
मुझे बुत में ज़रा तब्दील होने तो दे....
                 मौली।।

रविवार, 11 सितंबर 2016

बियाबां

वीरान बस्तियों के बियाबां बाग़ तरसते हैं एक एक बूँद को
बारिशों को भी देखो कमबख्त बरसते है जाकर सागर पे।।
                ।।मौली।।

बुधवार, 10 अगस्त 2016

वक्त

इक घड़ी क्या खरीद  ली हमने
वक्त तो मेरे पीछे ही पड़ गया।।
    मौली

मंगलवार, 9 अगस्त 2016

रुसवाईयाँ

रुसवाईयाँ

सच ज़िन्दगी की पीछे चलती रही पांव पांव
रुसवाईयाँ मेरे नसीब की आगे दौड़ती रही।।
             मौली

रविवार, 7 अगस्त 2016

जीवन पथ

पथरीले जीवन पथ पर चलते क्लांत रक्तरंजित पांव को दुलराया किसने क्या माँ आज भी अपनी ममता का आँचल बिछाये बैठी है राहों में मेरे।। मौली

गुरुवार, 4 अगस्त 2016

हाईवे का खौफ

हाईवे नाममात्र से ह्रदय वेदना और भय से कांप उठा।हाईवे इक रास्ता गन्तव्य तक पहुंचने का परंतु इस "हाईवे"नामक कृत्य ने जीवन के सारे रास्ते अवरुद्ध कर दिये।सारे उमंग सारे सपने ही नही समस्त रिश्तों को भी रौंद डाला उस भयावह काली रात ने। कौन सा नियम कौन सा कानून कौन सा आश्वासन उस हादसे को पाटेगा? कौन सा हस्ताक्षर दरिंदो को खौफनाक दंड देगा? जिससे पीड़ित परिवार को वो सब मिल जायेगा जो उस रात खोया? कितनी निर्भया कब तक मरती रहेंगी सहती रहेंगी पाश्विक अत्याचार? क्यों नही कोई कानून कोई नियम इन दरिंदों के लिये बना जिसके नाम मात्र से इनकी रूह कांप उठे और जघन्य कृत्य करने से पहले करोड़ों बार सोचे। नही साहब ऐसा कोई कानून ही नही बना अब तक हमारे देश में जिससे व्यभिचारी दण्डित हो।आरोपी बेख़ौफ़ घूमें और निर्दोष बलि चढ़े। युगों से हमारे देश में देवियां पूजी जाती है बड़े आयोजन और ढोंग होते हैं देवी पूजन का। नवरात्रि में वो घण्टे घड़ियाल,शंख,पुष्प और धूप दीप,मिष्ठानों से माँ का आह्वान और पूजा अर्चना की जाती है।बड़ी निष्ठा और भक्ति दिखाई जाती है और उसी नारी रूप को नाना प्रकार से अत्याचार किया जाता है,शोषण किया जाता है। जिस पत्थर की देवी को माँ माँ करता सिर पटकता नाक घिसता मंदिरों में,उसी माँ को गाली देते उसकी कोख को कलंकित करने और उसी देवी स्वरूपा बहु, बेटियों से पाश्विक कृत्य करने से बाज नही आता। अति तो देखिये माताओं को भी नही बख्शते। बेटियों,पत्नियों,माओं, बहनों और समस्त नारियों के लिये इतने कानून इतने रिवाज़ इतनी मर्यादायें बनी पर पुरुषों के लिये क्यों नही कोई कानून बना?? क्यों उनको इस दर्द का तनिक आभास नही होता या उन्हें अहसास कराया जाता,क्यों नही उनकी आज़ादी पे कोई प्रतिबन्ध लगता,क्यों कोई सीमायें और मर्यादायें उनपे लागू नही होती ?? क्यों आखिर क्यों? हर माँ अब बेटी को जन्म देने से पहले हज़ार बार सोचेगी,डरेगी,सहमेगी फिर शायद उसके भयावह भविष्य और वर्तमान को सोचकर आतंक से कोख में ही उसे मार देगी। जन्म दायिनी ही दिल पे पत्थर रख हंता बन अजन्मी बेटी का अंत कर देगी,कारण जन्मते ही तो वो हवस का शिकार बनेगी,समस्त रिश्ते शर्मशार होंगे,सभी रिश्तों को संदेह और भय से देखेगी।भाई, पिता,पति को भी संदेह से देखेगी,सहेगी अत्याचार तन मन का ,देगी बलिदान उम्र सारी और बदले में पायेगी दर्द,घृणा,अनादर,कुंठा,ग्लानि। शोषित होगी या एसिड से दग्ध की जायेगी या अग्नि से जलाई जायेगी या आत्महत्या करने पर मजबूर की जायेगी। पिता,पुत्र,भाई,पति आदि सभी रिश्तों के सामने या पीछे ये घृणित कृत्य होते हैं तब उनकी दशा कैसी होती होगी ? क्या वो अपने को असहाय नही पाते होंगे जब उन्ही की बहन बेटी उनकी ओर सवालिया दृष्टि से देख पूछेगी कि मेरा कसूर क्या था ? क्यों ये असहनीय शारीरिक और मानसिक अत्याचार हमे सहनी पड़ रही ? क्या कोई जवाब दे पाएंगे वे ? कितनी सभायें कितनी गोष्ठियां कितने ही राजनितिक प्रवचन हो। कितने ही झूठे आश्वासन दे लें वो, लचर कानून, प्रशासन और भ्रष्ट नेताओं के चलते यहाँ कुछ भी नही हो सकता । जब तक यहाँ की कानून व्यवस्था सशक्त नही होगी हर आरोपी को चाहे वो कोई भी तमगे या किसी स्तर का हो या हो भ्रष्टाचारी,बलात्कारी या आतंकी सभी को कठोर से कठोर दंड नही देंगे तब तक इन सब का विनाश और अंत नही होगा । बहुत हो चुका परपंच और धैर्य, अब होगी आरपार की लड़ाई वर्ना वो दिन दूर नही जब कांप उठेगी धरित्री और प्रलय से होगा विनाश। खौफ तले अब नही जियेगी कोई मासूम न ही किसी दुस्साशन को चीरहरण करने देगी।अब कानून को आँखे खोलनी होगी बहुत रह लिया कानून अंधा, प्रशासन को चुस्त दुरुस्त करना ही होगा। बहुत हो गये खेल तमाशे और बहुत सह चुकी नारी बनाम देवी।
       मौली चक्रवर्ती

बुधवार, 3 अगस्त 2016

सुनसान हाइवे

सुनसान हाईवे
~~~~~~~~
फर्राटे भरती गाड़ियों के
शोर में
खौफनाक घटना घटती रही
शासन दुस्साशन बना रहा
अस्मत तार तार होती रही
नारी शर्मशार होती रही
मानवता ज़ार ज़ार रोती रही
सुनसान हाईवे जश्न मनाता रहा

न ज़िन्दगी का कोई मोल रहा
न बची रिश्तों की कोई मर्यादा
क्रूरता और हैवानियत पुरज़ोर रहा
भीड़ में भी इंसान तन्हा रहा
सुनसान हाईवे जश्न मनाता रहा

अँधा कानून मूक बधिर बना रहा
राजनीति का तमाशा भी खूब रहा
चुनावी बाजार में नेताओं की सरगर्मियां पुरज़ोर रही
फरियादी की गुहार संसद के कोलाहल में दबता रहा
सुनसान हाईवे जश्न मनाता रहा

ज़िंदा लाशों को झूठे तसल्ली का कफ़न ओढ़ाते रहे
बेख़ौफ़ दरिंदे अगला शिकार तलाशते रहे
कुम्भ करण सा प्रशासन सोता रहा
नेता विरोधी दलों पे आरोपी रोटियां सेंकते रहे
सुनसान हाईवे जश्न मनाता रहा

कानून के रखवाले लिये बैशाखी नींद में सरपट दौड़ते रहे
दम तोड़ती सच्चाई पैदल चलती रही
देख ये खूंखार मंज़र धरित्री क्रंदन करती रही
सुनसान हाईवे अब काला इतिहास रचता रहेगा
सुनसान हाईवे मातम का जश्न मनाता रहेगा।।
               मौली

दरकते रिश्ते

दरकते रिश्तों की बर्फ पिघलने लगी
शायद अब भी कही आग बाकि है।।
    मौली

मंगलवार, 2 अगस्त 2016

कैसे भुला तू मुझे

तू मुझको कैसे भुला
मैं तो तुझमे ही हूँ
तू मुझमे है समाया
हर गीत संग गुनगुनाया
हर बोल तुझसे ही शुरू
हर सुर में तेरा ही सरगम
फिर तू मुझको कैसे भुला

तेरे संग जागी तेरे संग सोई
तू रहा भूखा जब जब
मैंने भी तोड़ा न एक भी निवाला
प्यासा रहा जो तू कभी
गला शुष्क हुआ मेरा
फिर कैसे भुला तू  मुझे

दिल जो दुखा तेरा तो आँखे मेरी रोई ज़ार ज़ार
चोट जो लगी तुझे कभी
मर्माहत हुई मैं
आँखे जो झपकी तेरी
सपने देखे आँखों ने मेरे
फिर कैसे भुला तू मुझे

आहट जो हुई कहीं घर
पे तेरे
तो अक्सर मैं चौंकी घबराकर
दरवाज़ा शायद खटका मेरा
जब कभी थका मांदा तू है आया
बदहवास सी मैं भागी अक्सर
न तू ही आया न तेरा पैगाम
फिर कैसे भुला तू मुझे

ज़मीं से आसमां पे बिठाकर
मुझे कहाँ चला और क्यों
तू मुझे यूँ तन्हा छोड़कर?
हाथ थामकर चलना सिखाकर
हाथ झटक कर कहाँ चले
मेरी हर शिकन पे विचलित
हो उठते थे तुमतो
फिर आज मेरे बिलखने
पर भी क्यों न रुके
अपना बनाकर मुझे आज
क्यों पराया कर चले सनम
फिर कैसे आज भुला तू मुझे

चिता तक के सफर तक
तो रुक जाओ
सुहागन का श्रृंगार तो पूरा करते जाओ
हाथों से मुझे लाल चुनर
तो ओढ़ाते जाओ
अगले जन्म में मेरे होगे
ये वादा तो पूरी करते जाओ
के पुकार लूँ आखिरी दफा
सनम ओ मेरे सनम
कैसे भूला तू  मुझे।।
    मौली

रविवार, 31 जुलाई 2016

आईना

खूब चलन इस दुनियां का,देखते हैं आईना खुद     
और खामियां दूसरों की गिनातें रहतें हैं।।
           मौली                          

जब शब्द शोर करने लगे
तब खामोशियाँ बोलती हैं।
        मौली

आवारा बादल

ऐ बादल, तू तो है आवारा और तेरी बारिश की बुँदे यायावर
न जाने कब और कहाँ ये उश्रृंखल हो उमड़ घुमड़ कर बरसें।।
   मौली

गुरुवार, 28 जुलाई 2016

भ्रमित मन

अल्हड़ नदी सा क्यों यूँ अनवरत बहता जाये ये मन
भ्रमित दिशाहारा सा किस ओर बहता जाये ये मन
सावन की रिमझिम में ये और उफ़न उफ़न सा जाये
किनारे की आस संजोये उन्मादित सा बहता जाये ये मन।।
           मौली

बुधवार, 27 जुलाई 2016

अतीत

मुझको अतीत कर खुद वर्तमान और भविष्य में क्या खूब रम गये
इतिहास के पन्नों पे काले अक्षर सा बिलखता मुझे तन्हा छोड़ आये।।
   मौली

सोमवार, 25 जुलाई 2016

बेशकीमती

यूँ सरेराह खुद को बेज़ार न करना
तूफानों से डरकर कश्ती न छोड़ना
तुझे पाकर ही तो मैं बेशकीमती हुई
हारकर फिर से मुझे गरीब न करना।।
       मौली

रविवार, 24 जुलाई 2016

~ज़र्द रिश्ता~

जर्जर दिल की ड्योढ़ी पे वो फिर साँझ का दिया जला गया
आया था चुपके से मिलने मगर अतीत रौशन कर गया
छोटी छोटी मीठी रंजिशों को ज़र्द रात बना गया
गमों की तपती रेत पे यादों की गीली चादर ओढ़ा गया
मुझे भी सब्र की नींद आ गयी सोचकर के,उसे सुकूँ आ गया
बीते हसीं लम्हों का कफ़न ओढ़े फिर सैलाबों का सावन आ गया।।
    मौली

रविवार, 17 जुलाई 2016

राष्ट्र प्रेम

वीरों की कुर्बानियों का यह देश है इस देश की धरित्री का जो सन्देश है वीरांगनाओं के माथे का अभिषेक है वैमनस्यता का ह्रास,प्रेम का समावेश है सब धर्मों का सम्मान यहाँ धृष्टता का क्षमादान नही कहती हूँ हर दिन हर रात हिन्द की मैं शेरनी महिषासुरों की हूँ नाशिनी जयहिन्द का उदघोष जहां कण कण में वयाप्त है बलिदानों की पवित्र भूमि हम सबका अभिमान है मेरा भारत महान है हम भारत की संतान हैं हिन्द की हम शान है हिन्द हमारी आन है आओ मिलकर प्रण लें हम आतंकवाद को निर्मूल करें "मैं"के अंधकार खोल से निकल हक़ीकत के सूर्य का स्वागत करें दुष्टों का नाश कर मानवता का आह्वान करें धरित्री के दुलारों तुमको माँ का क़र्ज़ चुकाना है रक्तरंजित हुई वसुंधरा को फिर से शष्य श्यामला बनाना है।। मौली वन्दे मातरम

गुरुवार, 14 जुलाई 2016

प्यार की इन्तहां

कुछ इस तरह इश्क किया हमने.... वो चाहे न चाहे हमे पर हमने तो चाहा है उन्हें दरो दीवार में उनकी यादों के साथ खुद को कैद किया है हमने इन्तहां प्यार की हद से गुज़र जाने तलक क्या जानूँ मेहरबां मुझ तक आयें न आयें अभी तो मशगूल वो महफ़िलों में मगर इक रोज़ उन्हें दरकार मेरे पहलू की होगी मेरी चाहत और बढ़ी जबसे जाना हमने कि उन्हें मेरा होना नही है कुबूल कितने रंग फैले मेरे चारो इंद्रधनुष को ही मचलुं क्यों रोज़ अब तो ये ज़िद है और जंग ईश्वर से गर मिलाया हमे तो बिछडन कैसे मंज़ूर हो हमें बंजारों से भटक रहे वो मृगतृष्णा की खोज में.... आखिर इक दिन लौटोगे सनम मेरे प्यार के मोह में कहते थे वो कि रिश्ते निभाते हैं वो हंस कर बोली मैं, के रिश्ते निभाना नही उनके वश में।। मौली

सोमवार, 11 जुलाई 2016

तेरे इश्क पे ऐतबार है हमे मगर
अपनी किस्मत पे हमे यकीं नही।।
           मौली

तमन्नाओं की शमा जलती रही
खवाहिशों की बोली लगती रही
पैमाने सब्र के रोज़ छलकते रहे
अमावस की रात और गहराती रही।।
              मौली

गुरुवार, 7 जुलाई 2016

वफ़ा

हमारे दरमियाँ ये कौन सा जज़्बा रह गया

जो न दोस्त रहा न ही दुश्मन रह गया

नफरतों के तूफां का कहर पुरज़ोर रहा

सैलाब भी वफ़ा के आशियाने बहा ले गया।।
              मौली

शनिवार, 2 जुलाई 2016

बाँहो का हाला

तेरे ही रंग में रंगना चाहूँ मैं पिया तेरे प्रेम का ही सोलह श्रृंगार मैं करूँ तेरे ही ह्रदय के तरंगों पे नृत्य मैं करूँ तेरी गीत,तेरी ग़ज़ल,तेरी ही कविता की शब्द "मैं" तेरे ही बांहों के हाला में कैद होना चाहुँ मैं तुझे ही चाहुँ तुझसे चुराकर तुझमे ही समाना चाहूँ मैं आराध्य भी तू,दुआ भी तू,तू ही पूण्य का फल तू ही आदि,तू ही अंत दूजा न कोई मेरे संग मैं चातक जन्मों की प्यासी स्वाति की ही हूँ अभिलाषी प्रिय आलिंगन के मोहपाश में बंधने को हूँ आतुर मैं बन गुजरिया राह तकूँ मैं तू क्यों न समझे पीर जिया की.... किस विध जतन करूँ पिया मैं,तेरे दर्शन पाऊँ तुझमें ही रच बस जाऊँ तेरे ही रंग रंगकर मैं अधरों पे सज जाऊँ..... बन मुरली की धुन कृष्ण तरंगित मैं हो जाऊँ.... मौली

सोमवार, 13 जून 2016

रह-ए-उल्फत

वादे वफ़ा का गुज़र गया कारवां यारों
रह-ए- उल्फ़त के गर्दो गुबार में।।
                  मौली

शनिवार, 21 मई 2016

कल शबे हिज़्र फिर तेरी बात चली
कसक तेरी यादों की अब कम हो चली
फिक्रमन्द रहता था जो दिल तेरे लिये
अब वो कहानी ही खत्म हो चली।।
मौली

शनिवार, 30 अप्रैल 2016

कितने कच्चे थे न तेरे वो उम्मीद के धागे
नित टूटते हैं नित नये गाँठ पड़ते जा रहे।।
          मौली

मंगलवार, 26 अप्रैल 2016

नारी

नारी हूँ मैं
कोमलांगी हूँ
सह्रदय हूँ
जननी हूँ
भगिनी हूँ
भार्या हूँ
बेटी हूँ
देवी,धरित्री
प्रकृति भी हूँ
मोहपाश में
बन्धी हुई
कोमल ह्रदया
त्याग की मूर्ति
तो सहनशीलता
की पराकाष्ठा भी मैं
अनगिनत रूप मेरे
कितने ही
अलंकारों से
अलंकृत!!!
"नारी"
फिर भी अभिशापित
क्यों ??
मेरे बिन अपूर्ण
ये संसार...
फिर क्यों, क्यों
कन्या भ्रूण हत्या ?
क्यों क्रूर प्रपंच
कोख में अजन्मी
मेरे अस्तित्व को
निर्मूल करने की?
हा रे हंता..
          मौली

गुरुवार, 21 अप्रैल 2016

सहेज कर रक्खी
तुम्हारे यादों की
पोटली आज खोली
सोचा,कुछ अनमोल पल
चुन लूँ कुछ विसर्जित
कर दूँ......
अरे ! ये क्या ?
कुछ भी नही शेष बचा
तुम्हारी बेवफाई का दीमक
उन यादों को निर्मूल
कर गया...
आस की दवा भी
कब तक
हिफाज़त करती।।
मौली

बुधवार, 20 अप्रैल 2016

कितने फासले थे हम दोनों के दरमियां मगर......
    मोहब्बत की इन्तहां तो देखो ज़ज़्बात लावा बनकर भी ख़ामोशी से बहते रहे।।
          मौली

शनिवार, 16 अप्रैल 2016

बुत

बुत बन चुकी मेरी  ख्वाहिशों को जज़्बातों की आग से यूँ न दहकाओ
जो पिघलने लगी तेरे इश्क में सनम तो कहीं फिर न हों उम्मीदों की नुमाइशें।।
       मौली

सोमवार, 11 अप्रैल 2016

सूफियाना

मेरी इश्क की फकीरी भी क्या खूब रंग लायी है
के अब हर अंदाज़ देखो सूफियाना हो चला है।।
                     ।।मौली।।

शुक्रवार, 1 अप्रैल 2016

चलो आज थोडा रूमानी हो जायें

चाँद हो तश्तरी और तारे छप्पन भोग
आसमां बिछावन बन जाये
बादल  चादर बन जाये
चलो आज थोडा रूमानी हो जायें।।

सागर की लहरें झूला बन जायें
नदियां मेरी सखियाँ बन जायें
सम्पूर्ण प्रकृति माँ की गोद बन जाये
चलो आज थोडा रूमानी हो जायें।।

दिल नौनिहालों सा सरल बन जाये
पर्वत रथ और सूर्य सारथी बन जायें
पृथ्वी शतरंज,ग्रह उपग्रह मोहरें बन जायें
चलो आज थोडा रूमानी हो जाये।।
     मौली

बुधवार, 30 मार्च 2016

प्रतीक्षा

सावन बीता,भादों बीता ,बीता शरद और हेमन्त बीता ऋतुराज बसंत भी बीता टेसू संग फागुन पर रीता रहा तन मन किस ऋतु तुम सुध लोगे पूछे अब खग विहंग इक इक पल लगे हैं सदियाँ कितनी करूँ मनुहार न ध्यान लगे प्रभु में, न भक्ति ही करी जाय साँझ सवेरे जपूं तुझी को तुझी में खोजूं सार जीवन की समझे कौन पीर जिया की विरह वेदना से मर्माहत मैं करूँ तुझे सुमिरन नयन बहे अविरल ढूंढे तुझे हरपल।। मौली
तेरे ही रंग में रंगना चाहूँ पिया मैं तेरे प्रेम का ही सोलह श्रृंगार करूँ मैं तेरे ही ह्रदय के तरंगों पे करूँ नृत्य मैं तेरी गीत तेरी ग़ज़ल तेरी ही कविता की शब्द मैं तेरे ही बांहों के हाला में कैद होना चाहुँ मैं तुझे ही चाहुँ तुझसे चुराकर तुझमे ही समां जाऊँ आराध्य भी तू दुआ भी तू,तू ही पूण्य का फल तू ही आदि तू ही अंत दूजा न कोई मेरे संग मैं चातक जन्मों की प्यासी स्वाति की ही अभिलाषी प्रिय आलिंगन के मोहपाश में बंधने को आतुर बन गुजरिया राह तकूँ मैं तू न समझे पीर पराई .... किस विध जतन करूँ पिया मैं,तेरे दर्शन पाऊँ तेरे ही रंग रंगकर मैं अधरों पे सज जाऊँ..... बन मुरली की धुन तरंगित मैं हो जाऊँ.... मौली

बुधवार, 23 मार्च 2016

अबके फागुन

अबके फागुन कुछ यूँ मनायें नफरतों को करें दहन प्रेम का अलख जलायें खेली बहुत खूनी होली बोलें अब इंसानियत की बोली फैली हर तरफ वैमनस्यता की आग अबके फैलायें मोहब्बतों का फाग नफरतों को तजकर एक मिसाल बनायें आओ मिलजुल कर मित्रता का उत्सव मनायें धर्म जाति मन्दिर मस्ज़िद के परे मानवता का एक सुंदर अध्याय रचें देशहित का ध्यान धरें मातृ भूमि को नमन करें प्रेम के सतरंगी रंगो में रंगकर शांति का नया इतिहास रचकर चलो न सब नित नये त्यौहार मनायें अबके फागुन कुछ यूँ मनायें।। मौली

सोमवार, 14 मार्च 2016

यक्ष प्रश्न

एक प्रश्न जो कभी नौनिहाल था फिर तरुण हुआ तत्पश्चात युवा और फिर वृद्धावस्था वो प्रश्न आज भी प्रश्नवाचक चिन्ह लिए ज्यों का त्यों विधमान है। अंततगोत्वा वो यक्षप्रश्न बना हुआ है क्या इस प्रश्न का उत्तर ईमानदारी से कोई दे पायेगा?? बूढ़ा जर्जर हो चला प्रश्न और उत्तर... नवयौवना सी इठलाती चंचल नदी की मानिंद उफनती उछलती हर सीमाओं को लांघती चली जा रही,बेचारा प्रश्न आज भी उलझा अपनी ही जाल में.... क्या हम मनुष्य का जन्म पाकर भी मनुष्य बन पाएं क्या हम अपने जन्म को सार्थक कर पायें कर्म धर्म का सामान्य अर्थ भी समझ पायें पशुओं को भी शर्मशार कर हम इंसान कहलाते हैं,ग्लानि का बोध तक नही क्यों? मौली

शनिवार, 12 मार्च 2016

यक्ष प्रश्न

एक प्रश्न जो कभी नौनिहाल था फिर तरुण हुआ तत्पश्चात युवा और फिर वृद्धावस्था वो प्रश्न आज भी प्रश्नवाचक चिन्ह लिए ज्यों का त्यों विधमान है। अंततगोत्वा वो यक्षप्रश्न बना हुआ है क्या इस प्रश्न का उत्तर ईमानदारी से कोई दे पायेगा?? मनुष्य रूप देकर परमात्मा ने हमे भेजा पर क्या हम अपने जन्म को सार्थक कर पायें कर्म धर्म का सामान्य अर्थ समझ पायें पशुओं को भी शर्मशार कर हम इंसान कहलाते हैं,ग्लानि का बोध तक नही क्यों? मौली

बुधवार, 24 फ़रवरी 2016

बावरा मन

बावरा ये मन हरपल तेरे ही रंग में रंगा   
ह्रदय में अनगिनत सतरंगी स्वप्न है सजा  
जीवन में क्यों आया यूँ अमावस का अँधेरा
आ जाओ न अब बनके चंद्रमा का हाला।।
              मौली




बुधवार, 17 फ़रवरी 2016



फिर न कहना मुझसे, कभी के तुम न बदलोगे कभी
मौसम बदल जाया करते है फिर इंसान की क्या बिसात।।
                               ~~~~मौली~~~~