शुक्रवार, 23 दिसंबर 2016
गुरुवार, 15 दिसंबर 2016
कागज़ का दर्द
चाहत
मौसमों में चाहतों के रंग भरना चाहिये।
कुछ न कुछ ख़ामोशियों के दिल धड़कना चाहिये।
मेरा दिल कबतक हथेली पर मेरी तन्हा रहे,
तुझको भी तो जिस्म से बाहर निकलना चाहिए।
कैसे मानूं प्यार के इस खेल में माहिर है तू,
आँसुओं के ज़ख़्म से बिछड़न उबलना चाहिए।
रुसवाईयाँ,तन्हाईयाँ,दर्द,आहें और तड़प,
ऐसे मौसम में मुझे अब खुलके हँसना चाहिए।
सिसकियाँ तन्हाईयाँ रुस्वाईयाँ आहें तड़प,
ऐसे मौसम में मुझे कुछ खुलके हँसना चाहिए।
आज़माइश साज़िशें हैं मैं हूँ और क़िस्मत मिरी,
सोचती हूँ किसकी आँखों को छलकना चाहिए।
मौली
बुधवार, 14 दिसंबर 2016
मंगलवार, 13 दिसंबर 2016
सोमवार, 12 दिसंबर 2016
शनिवार, 10 दिसंबर 2016
अधूरे सपने
शुक्रवार, 9 दिसंबर 2016
रात
रविवार, 4 दिसंबर 2016
शुक्रवार, 25 नवंबर 2016
हिज़्र
आकर दबे पांव शब यूँ चली जाती है रोज़
पसरे हुए सन्नाटों में सिर्फ सुना जाती है सोज़
कभी तुम भी तो नींद से उठकर देखो ज़रा
हिज्र की तन्हा रातों के मंज़रों का ओज़।।
२५.११.२०१६
मौली
मंगलवार, 22 नवंबर 2016
शुक्रवार, 11 नवंबर 2016
रविवार, 6 नवंबर 2016
शनिवार, 5 नवंबर 2016
गुरुवार, 3 नवंबर 2016
अधूरे सपने
कैसी चाँद रात थी दिल पर अँधियारे गहराये थे।
रातों की धडकन को जब भी गिनती सहमी साँसों से,
बिछडन की चादर फैलाकर मौन अधर बैठाये थे ।
ऐसे में ही मेरे प्रियतम मुझसे मिलने आये थे।
आतुर व्याकुल प्यास रखी थी क्वाँरे क्वाँरे नैनों में,
रातों ने तेरी यादों के मौसम जब दहकाये थे।
पेडों की झुरमुट से चंदा लुकाछुपी जब खेला था,
टूटके हरसिंगार ने साये ख़ुशबू के बिखराये थे।
पग में लाज की जंजीरें थी सामने थे प्रियतम तुम भी,
क़समों वादों के बादल फिर आँखों में बौराये थे।
अन्तस् की चंचल सरिता फिर आलिंगन को मचल उठी,
सागर जैसे अपने बाज़ू तुमने जब फैलाये थे।
पिहू पिहू में पीर सुलगती चातक क्रंदन करता था,
आशाओं के सारे पलछिन साँसों ने बिसराये थे।
आधे रहे अधूरे सपने कुछ तेरे कुछ मेरे भी,
नयन विदाई की बेला में "मौली" ये कह पाये थे।
बुधवार, 2 नवंबर 2016
सोमवार, 17 अक्टूबर 2016
शुक्रवार, 16 सितंबर 2016
मंगलवार, 13 सितंबर 2016
बुत
ज़रा तो ठहरो... फ़ेर के निगाहें जाने वाले...
भ्रम के मायाजाल से निकलने तो दो.....
रिश्ते के ढाई आखर को सहेजने तो दे
पन्नें, मेरे भरोसे के बटोरने तो दे.....
चले जाना के पलकों के कतारों को भींग जाने तो दे..... सिरहाने रख दूँ दुआएं ये मोहलत तो दे....
फरेब की सिलवटों को जी भरके फिर देखने तो दे.....
जा ...के अब न मिलूंगी फिर दोबारा कभी
मुझे बुत में ज़रा तब्दील होने तो दे......
मुझे बुत में ज़रा तब्दील होने तो दे....
मौली।।
रविवार, 11 सितंबर 2016
बियाबां
वीरान बस्तियों के बियाबां बाग़ तरसते हैं एक एक बूँद को
बारिशों को भी देखो कमबख्त बरसते है जाकर सागर पे।।
।।मौली।।
बुधवार, 10 अगस्त 2016
मंगलवार, 9 अगस्त 2016
रविवार, 7 अगस्त 2016
जीवन पथ
गुरुवार, 4 अगस्त 2016
हाईवे का खौफ
हाईवे नाममात्र से ह्रदय वेदना और भय से कांप उठा।हाईवे इक रास्ता गन्तव्य तक पहुंचने का परंतु इस "हाईवे"नामक कृत्य ने जीवन के सारे रास्ते अवरुद्ध कर दिये।सारे उमंग सारे सपने ही नही समस्त रिश्तों को भी रौंद डाला उस भयावह काली रात ने। कौन सा नियम कौन सा कानून कौन सा आश्वासन उस हादसे को पाटेगा? कौन सा हस्ताक्षर दरिंदो को खौफनाक दंड देगा? जिससे पीड़ित परिवार को वो सब मिल जायेगा जो उस रात खोया? कितनी निर्भया कब तक मरती रहेंगी सहती रहेंगी पाश्विक अत्याचार? क्यों नही कोई कानून कोई नियम इन दरिंदों के लिये बना जिसके नाम मात्र से इनकी रूह कांप उठे और जघन्य कृत्य करने से पहले करोड़ों बार सोचे। नही साहब ऐसा कोई कानून ही नही बना अब तक हमारे देश में जिससे व्यभिचारी दण्डित हो।आरोपी बेख़ौफ़ घूमें और निर्दोष बलि चढ़े। युगों से हमारे देश में देवियां पूजी जाती है बड़े आयोजन और ढोंग होते हैं देवी पूजन का। नवरात्रि में वो घण्टे घड़ियाल,शंख,पुष्प और धूप दीप,मिष्ठानों से माँ का आह्वान और पूजा अर्चना की जाती है।बड़ी निष्ठा और भक्ति दिखाई जाती है और उसी नारी रूप को नाना प्रकार से अत्याचार किया जाता है,शोषण किया जाता है। जिस पत्थर की देवी को माँ माँ करता सिर पटकता नाक घिसता मंदिरों में,उसी माँ को गाली देते उसकी कोख को कलंकित करने और उसी देवी स्वरूपा बहु, बेटियों से पाश्विक कृत्य करने से बाज नही आता। अति तो देखिये माताओं को भी नही बख्शते। बेटियों,पत्नियों,माओं, बहनों और समस्त नारियों के लिये इतने कानून इतने रिवाज़ इतनी मर्यादायें बनी पर पुरुषों के लिये क्यों नही कोई कानून बना?? क्यों उनको इस दर्द का तनिक आभास नही होता या उन्हें अहसास कराया जाता,क्यों नही उनकी आज़ादी पे कोई प्रतिबन्ध लगता,क्यों कोई सीमायें और मर्यादायें उनपे लागू नही होती ?? क्यों आखिर क्यों? हर माँ अब बेटी को जन्म देने से पहले हज़ार बार सोचेगी,डरेगी,सहमेगी फिर शायद उसके भयावह भविष्य और वर्तमान को सोचकर आतंक से कोख में ही उसे मार देगी। जन्म दायिनी ही दिल पे पत्थर रख हंता बन अजन्मी बेटी का अंत कर देगी,कारण जन्मते ही तो वो हवस का शिकार बनेगी,समस्त रिश्ते शर्मशार होंगे,सभी रिश्तों को संदेह और भय से देखेगी।भाई, पिता,पति को भी संदेह से देखेगी,सहेगी अत्याचार तन मन का ,देगी बलिदान उम्र सारी और बदले में पायेगी दर्द,घृणा,अनादर,कुंठा,ग्लानि। शोषित होगी या एसिड से दग्ध की जायेगी या अग्नि से जलाई जायेगी या आत्महत्या करने पर मजबूर की जायेगी। पिता,पुत्र,भाई,पति आदि सभी रिश्तों के सामने या पीछे ये घृणित कृत्य होते हैं तब उनकी दशा कैसी होती होगी ? क्या वो अपने को असहाय नही पाते होंगे जब उन्ही की बहन बेटी उनकी ओर सवालिया दृष्टि से देख पूछेगी कि मेरा कसूर क्या था ? क्यों ये असहनीय शारीरिक और मानसिक अत्याचार हमे सहनी पड़ रही ? क्या कोई जवाब दे पाएंगे वे ? कितनी सभायें कितनी गोष्ठियां कितने ही राजनितिक प्रवचन हो। कितने ही झूठे आश्वासन दे लें वो, लचर कानून, प्रशासन और भ्रष्ट नेताओं के चलते यहाँ कुछ भी नही हो सकता । जब तक यहाँ की कानून व्यवस्था सशक्त नही होगी हर आरोपी को चाहे वो कोई भी तमगे या किसी स्तर का हो या हो भ्रष्टाचारी,बलात्कारी या आतंकी सभी को कठोर से कठोर दंड नही देंगे तब तक इन सब का विनाश और अंत नही होगा । बहुत हो चुका परपंच और धैर्य, अब होगी आरपार की लड़ाई वर्ना वो दिन दूर नही जब कांप उठेगी धरित्री और प्रलय से होगा विनाश। खौफ तले अब नही जियेगी कोई मासूम न ही किसी दुस्साशन को चीरहरण करने देगी।अब कानून को आँखे खोलनी होगी बहुत रह लिया कानून अंधा, प्रशासन को चुस्त दुरुस्त करना ही होगा। बहुत हो गये खेल तमाशे और बहुत सह चुकी नारी बनाम देवी।
मौली चक्रवर्ती
बुधवार, 3 अगस्त 2016
सुनसान हाइवे
सुनसान हाईवे
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फर्राटे भरती गाड़ियों के
शोर में
खौफनाक घटना घटती रही
शासन दुस्साशन बना रहा
अस्मत तार तार होती रही
नारी शर्मशार होती रही
मानवता ज़ार ज़ार रोती रही
सुनसान हाईवे जश्न मनाता रहा
न ज़िन्दगी का कोई मोल रहा
न बची रिश्तों की कोई मर्यादा
क्रूरता और हैवानियत पुरज़ोर रहा
भीड़ में भी इंसान तन्हा रहा
सुनसान हाईवे जश्न मनाता रहा
अँधा कानून मूक बधिर बना रहा
राजनीति का तमाशा भी खूब रहा
चुनावी बाजार में नेताओं की सरगर्मियां पुरज़ोर रही
फरियादी की गुहार संसद के कोलाहल में दबता रहा
सुनसान हाईवे जश्न मनाता रहा
ज़िंदा लाशों को झूठे तसल्ली का कफ़न ओढ़ाते रहे
बेख़ौफ़ दरिंदे अगला शिकार तलाशते रहे
कुम्भ करण सा प्रशासन सोता रहा
नेता विरोधी दलों पे आरोपी रोटियां सेंकते रहे
सुनसान हाईवे जश्न मनाता रहा
कानून के रखवाले लिये बैशाखी नींद में सरपट दौड़ते रहे
दम तोड़ती सच्चाई पैदल चलती रही
देख ये खूंखार मंज़र धरित्री क्रंदन करती रही
सुनसान हाईवे अब काला इतिहास रचता रहेगा
सुनसान हाईवे मातम का जश्न मनाता रहेगा।।
मौली
मंगलवार, 2 अगस्त 2016
कैसे भुला तू मुझे
तू मुझको कैसे भुला
मैं तो तुझमे ही हूँ
तू मुझमे है समाया
हर गीत संग गुनगुनाया
हर बोल तुझसे ही शुरू
हर सुर में तेरा ही सरगम
फिर तू मुझको कैसे भुला
तेरे संग जागी तेरे संग सोई
तू रहा भूखा जब जब
मैंने भी तोड़ा न एक भी निवाला
प्यासा रहा जो तू कभी
गला शुष्क हुआ मेरा
फिर कैसे भुला तू मुझे
दिल जो दुखा तेरा तो आँखे मेरी रोई ज़ार ज़ार
चोट जो लगी तुझे कभी
मर्माहत हुई मैं
आँखे जो झपकी तेरी
सपने देखे आँखों ने मेरे
फिर कैसे भुला तू मुझे
आहट जो हुई कहीं घर
पे तेरे
तो अक्सर मैं चौंकी घबराकर
दरवाज़ा शायद खटका मेरा
जब कभी थका मांदा तू है आया
बदहवास सी मैं भागी अक्सर
न तू ही आया न तेरा पैगाम
फिर कैसे भुला तू मुझे
ज़मीं से आसमां पे बिठाकर
मुझे कहाँ चला और क्यों
तू मुझे यूँ तन्हा छोड़कर?
हाथ थामकर चलना सिखाकर
हाथ झटक कर कहाँ चले
मेरी हर शिकन पे विचलित
हो उठते थे तुमतो
फिर आज मेरे बिलखने
पर भी क्यों न रुके
अपना बनाकर मुझे आज
क्यों पराया कर चले सनम
फिर कैसे आज भुला तू मुझे
चिता तक के सफर तक
तो रुक जाओ
सुहागन का श्रृंगार तो पूरा करते जाओ
हाथों से मुझे लाल चुनर
तो ओढ़ाते जाओ
अगले जन्म में मेरे होगे
ये वादा तो पूरी करते जाओ
के पुकार लूँ आखिरी दफा
सनम ओ मेरे सनम
कैसे भूला तू मुझे।।
मौली
रविवार, 31 जुलाई 2016
आवारा बादल
ऐ बादल, तू तो है आवारा और तेरी बारिश की बुँदे यायावर
न जाने कब और कहाँ ये उश्रृंखल हो उमड़ घुमड़ कर बरसें।।
मौली
गुरुवार, 28 जुलाई 2016
भ्रमित मन
अल्हड़ नदी सा क्यों यूँ अनवरत बहता जाये ये मन
भ्रमित दिशाहारा सा किस ओर बहता जाये ये मन
सावन की रिमझिम में ये और उफ़न उफ़न सा जाये
किनारे की आस संजोये उन्मादित सा बहता जाये ये मन।।
मौली
बुधवार, 27 जुलाई 2016
अतीत
मुझको अतीत कर खुद वर्तमान और भविष्य में क्या खूब रम गये
इतिहास के पन्नों पे काले अक्षर सा बिलखता मुझे तन्हा छोड़ आये।।
मौली
सोमवार, 25 जुलाई 2016
बेशकीमती
यूँ सरेराह खुद को बेज़ार न करना
तूफानों से डरकर कश्ती न छोड़ना
तुझे पाकर ही तो मैं बेशकीमती हुई
हारकर फिर से मुझे गरीब न करना।।
मौली
रविवार, 24 जुलाई 2016
~ज़र्द रिश्ता~
जर्जर दिल की ड्योढ़ी पे वो फिर साँझ का दिया जला गया
आया था चुपके से मिलने मगर अतीत रौशन कर गया
छोटी छोटी मीठी रंजिशों को ज़र्द रात बना गया
गमों की तपती रेत पे यादों की गीली चादर ओढ़ा गया
मुझे भी सब्र की नींद आ गयी सोचकर के,उसे सुकूँ आ गया
बीते हसीं लम्हों का कफ़न ओढ़े फिर सैलाबों का सावन आ गया।।
मौली
रविवार, 17 जुलाई 2016
राष्ट्र प्रेम
गुरुवार, 14 जुलाई 2016
प्यार की इन्तहां
सोमवार, 11 जुलाई 2016
गुरुवार, 7 जुलाई 2016
वफ़ा
हमारे दरमियाँ ये कौन सा जज़्बा रह गया
जो न दोस्त रहा न ही दुश्मन रह गया
नफरतों के तूफां का कहर पुरज़ोर रहा
सैलाब भी वफ़ा के आशियाने बहा ले गया।।
मौली
शनिवार, 2 जुलाई 2016
बाँहो का हाला
सोमवार, 13 जून 2016
शनिवार, 21 मई 2016
मंगलवार, 26 अप्रैल 2016
नारी
नारी हूँ मैं
कोमलांगी हूँ
सह्रदय हूँ
जननी हूँ
भगिनी हूँ
भार्या हूँ
बेटी हूँ
देवी,धरित्री
प्रकृति भी हूँ
मोहपाश में
बन्धी हुई
कोमल ह्रदया
त्याग की मूर्ति
तो सहनशीलता
की पराकाष्ठा भी मैं
अनगिनत रूप मेरे
कितने ही
अलंकारों से
अलंकृत!!!
"नारी"
फिर भी अभिशापित
क्यों ??
मेरे बिन अपूर्ण
ये संसार...
फिर क्यों, क्यों
कन्या भ्रूण हत्या ?
क्यों क्रूर प्रपंच
कोख में अजन्मी
मेरे अस्तित्व को
निर्मूल करने की?
हा रे हंता..
मौली
गुरुवार, 21 अप्रैल 2016
बुधवार, 20 अप्रैल 2016
शनिवार, 16 अप्रैल 2016
बुत
बुत बन चुकी मेरी ख्वाहिशों को जज़्बातों की आग से यूँ न दहकाओ
जो पिघलने लगी तेरे इश्क में सनम तो कहीं फिर न हों उम्मीदों की नुमाइशें।।
मौली
सोमवार, 11 अप्रैल 2016
शुक्रवार, 1 अप्रैल 2016
चलो आज थोडा रूमानी हो जायें
चाँद हो तश्तरी और तारे छप्पन भोग
आसमां बिछावन बन जाये
बादल चादर बन जाये
चलो आज थोडा रूमानी हो जायें।।
सागर की लहरें झूला बन जायें
नदियां मेरी सखियाँ बन जायें
सम्पूर्ण प्रकृति माँ की गोद बन जाये
चलो आज थोडा रूमानी हो जायें।।
दिल नौनिहालों सा सरल बन जाये
पर्वत रथ और सूर्य सारथी बन जायें
पृथ्वी शतरंज,ग्रह उपग्रह मोहरें बन जायें
चलो आज थोडा रूमानी हो जाये।।
मौली
बुधवार, 30 मार्च 2016
प्रतीक्षा
बुधवार, 23 मार्च 2016
अबके फागुन
मंगलवार, 22 मार्च 2016
सोमवार, 21 मार्च 2016
सोमवार, 14 मार्च 2016
यक्ष प्रश्न
शनिवार, 12 मार्च 2016
यक्ष प्रश्न
बुधवार, 24 फ़रवरी 2016
बावरा मन
बावरा ये मन हरपल तेरे ही रंग में रंगा
ह्रदय में अनगिनत सतरंगी स्वप्न है सजा
जीवन में क्यों आया यूँ अमावस का अँधेरा
आ जाओ न अब बनके चंद्रमा का हाला।।
मौली
