तू मुझको कैसे भुला
मैं तो तुझमे ही हूँ
तू मुझमे है समाया
हर गीत संग गुनगुनाया
हर बोल तुझसे ही शुरू
हर सुर में तेरा ही सरगम
फिर तू मुझको कैसे भुला
तेरे संग जागी तेरे संग सोई
तू रहा भूखा जब जब
मैंने भी तोड़ा न एक भी निवाला
प्यासा रहा जो तू कभी
गला शुष्क हुआ मेरा
फिर कैसे भुला तू मुझे
दिल जो दुखा तेरा तो आँखे मेरी रोई ज़ार ज़ार
चोट जो लगी तुझे कभी
मर्माहत हुई मैं
आँखे जो झपकी तेरी
सपने देखे आँखों ने मेरे
फिर कैसे भुला तू मुझे
आहट जो हुई कहीं घर
पे तेरे
तो अक्सर मैं चौंकी घबराकर
दरवाज़ा शायद खटका मेरा
जब कभी थका मांदा तू है आया
बदहवास सी मैं भागी अक्सर
न तू ही आया न तेरा पैगाम
फिर कैसे भुला तू मुझे
ज़मीं से आसमां पे बिठाकर
मुझे कहाँ चला और क्यों
तू मुझे यूँ तन्हा छोड़कर?
हाथ थामकर चलना सिखाकर
हाथ झटक कर कहाँ चले
मेरी हर शिकन पे विचलित
हो उठते थे तुमतो
फिर आज मेरे बिलखने
पर भी क्यों न रुके
अपना बनाकर मुझे आज
क्यों पराया कर चले सनम
फिर कैसे आज भुला तू मुझे
चिता तक के सफर तक
तो रुक जाओ
सुहागन का श्रृंगार तो पूरा करते जाओ
हाथों से मुझे लाल चुनर
तो ओढ़ाते जाओ
अगले जन्म में मेरे होगे
ये वादा तो पूरी करते जाओ
के पुकार लूँ आखिरी दफा
सनम ओ मेरे सनम
कैसे भूला तू मुझे।।
मौली
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें