हाईवे नाममात्र से ह्रदय वेदना और भय से कांप उठा।हाईवे इक रास्ता गन्तव्य तक पहुंचने का परंतु इस "हाईवे"नामक कृत्य ने जीवन के सारे रास्ते अवरुद्ध कर दिये।सारे उमंग सारे सपने ही नही समस्त रिश्तों को भी रौंद डाला उस भयावह काली रात ने। कौन सा नियम कौन सा कानून कौन सा आश्वासन उस हादसे को पाटेगा? कौन सा हस्ताक्षर दरिंदो को खौफनाक दंड देगा? जिससे पीड़ित परिवार को वो सब मिल जायेगा जो उस रात खोया? कितनी निर्भया कब तक मरती रहेंगी सहती रहेंगी पाश्विक अत्याचार? क्यों नही कोई कानून कोई नियम इन दरिंदों के लिये बना जिसके नाम मात्र से इनकी रूह कांप उठे और जघन्य कृत्य करने से पहले करोड़ों बार सोचे। नही साहब ऐसा कोई कानून ही नही बना अब तक हमारे देश में जिससे व्यभिचारी दण्डित हो।आरोपी बेख़ौफ़ घूमें और निर्दोष बलि चढ़े। युगों से हमारे देश में देवियां पूजी जाती है बड़े आयोजन और ढोंग होते हैं देवी पूजन का। नवरात्रि में वो घण्टे घड़ियाल,शंख,पुष्प और धूप दीप,मिष्ठानों से माँ का आह्वान और पूजा अर्चना की जाती है।बड़ी निष्ठा और भक्ति दिखाई जाती है और उसी नारी रूप को नाना प्रकार से अत्याचार किया जाता है,शोषण किया जाता है। जिस पत्थर की देवी को माँ माँ करता सिर पटकता नाक घिसता मंदिरों में,उसी माँ को गाली देते उसकी कोख को कलंकित करने और उसी देवी स्वरूपा बहु, बेटियों से पाश्विक कृत्य करने से बाज नही आता। अति तो देखिये माताओं को भी नही बख्शते। बेटियों,पत्नियों,माओं, बहनों और समस्त नारियों के लिये इतने कानून इतने रिवाज़ इतनी मर्यादायें बनी पर पुरुषों के लिये क्यों नही कोई कानून बना?? क्यों उनको इस दर्द का तनिक आभास नही होता या उन्हें अहसास कराया जाता,क्यों नही उनकी आज़ादी पे कोई प्रतिबन्ध लगता,क्यों कोई सीमायें और मर्यादायें उनपे लागू नही होती ?? क्यों आखिर क्यों? हर माँ अब बेटी को जन्म देने से पहले हज़ार बार सोचेगी,डरेगी,सहमेगी फिर शायद उसके भयावह भविष्य और वर्तमान को सोचकर आतंक से कोख में ही उसे मार देगी। जन्म दायिनी ही दिल पे पत्थर रख हंता बन अजन्मी बेटी का अंत कर देगी,कारण जन्मते ही तो वो हवस का शिकार बनेगी,समस्त रिश्ते शर्मशार होंगे,सभी रिश्तों को संदेह और भय से देखेगी।भाई, पिता,पति को भी संदेह से देखेगी,सहेगी अत्याचार तन मन का ,देगी बलिदान उम्र सारी और बदले में पायेगी दर्द,घृणा,अनादर,कुंठा,ग्लानि। शोषित होगी या एसिड से दग्ध की जायेगी या अग्नि से जलाई जायेगी या आत्महत्या करने पर मजबूर की जायेगी। पिता,पुत्र,भाई,पति आदि सभी रिश्तों के सामने या पीछे ये घृणित कृत्य होते हैं तब उनकी दशा कैसी होती होगी ? क्या वो अपने को असहाय नही पाते होंगे जब उन्ही की बहन बेटी उनकी ओर सवालिया दृष्टि से देख पूछेगी कि मेरा कसूर क्या था ? क्यों ये असहनीय शारीरिक और मानसिक अत्याचार हमे सहनी पड़ रही ? क्या कोई जवाब दे पाएंगे वे ? कितनी सभायें कितनी गोष्ठियां कितने ही राजनितिक प्रवचन हो। कितने ही झूठे आश्वासन दे लें वो, लचर कानून, प्रशासन और भ्रष्ट नेताओं के चलते यहाँ कुछ भी नही हो सकता । जब तक यहाँ की कानून व्यवस्था सशक्त नही होगी हर आरोपी को चाहे वो कोई भी तमगे या किसी स्तर का हो या हो भ्रष्टाचारी,बलात्कारी या आतंकी सभी को कठोर से कठोर दंड नही देंगे तब तक इन सब का विनाश और अंत नही होगा । बहुत हो चुका परपंच और धैर्य, अब होगी आरपार की लड़ाई वर्ना वो दिन दूर नही जब कांप उठेगी धरित्री और प्रलय से होगा विनाश। खौफ तले अब नही जियेगी कोई मासूम न ही किसी दुस्साशन को चीरहरण करने देगी।अब कानून को आँखे खोलनी होगी बहुत रह लिया कानून अंधा, प्रशासन को चुस्त दुरुस्त करना ही होगा। बहुत हो गये खेल तमाशे और बहुत सह चुकी नारी बनाम देवी।
मौली चक्रवर्ती
तुम्हारी खोज से क्लान्त हो आश्रय लिया जहाँ....... वो है विहँग नीड़
गुरुवार, 4 अगस्त 2016
हाईवे का खौफ
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