आज़माइश साज़िशें हैं मैं हूँ और क़िस्मत मिरी,
सोचती हूँ किसकी आँखों को छलकना चाहिए।
मौली
शनिवार, 25 अगस्त 2018
सोमवार, 20 अगस्त 2018
ख्वाब
शुक्रवार, 17 अगस्त 2018
सोमवार, 13 अगस्त 2018
शरणार्थी
गहनतम घनेरी ह्र्दयस्थल में
एक अकेला शरणार्थी बन
आ जाओ जो मेरे जीवन में
सप्तसुर बन गूँजूं मैं
इन सुंदर फ़िज़ाओं में
जो बन आ जाओ इंद्रधनुष
सारे रंग मुझपे फब जायें
जो बन जाओ ओस की बूंदें
मेरे ख़ुश्क होंठ प्लावित हो जायें
जो तुम जुगनूं बन आ जाओ
मेरी स्याह रात प्रकाशित हो जायें।।
मौली
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बंद शामें
किसे बताऊं कितनी शामें बन्द कमरों में कैसे बिताई है
कितनी बेबसियों कितनी बेचैनियों में गुज़ारे हर लम्हे
सिफारिश की पिंजर से रूह के चले जाने की
न सरगोशियां ही काम आई न गुज़ारिशें मंज़ूर हुई
हिज़्र की रातें थी मेरी और सहर भी सज़ायाफ्ता
नींदे तो गिरवी रख आयी थी सपने भी बेमोल बिके
ख्वाहिशें सूद के किश्तों में बेशुमार जाने लगी
कपड़ों के बदले तन का सौदा न कर सकी कभी
मिले जो ग़म बेतहाशा उन्हें हमसफ़र बना लिया
जिसे हमराज़ बनाया उसने ही मुझे तार तार किया।।
मौली