तुम्हारी खोज से क्लान्त हो आश्रय लिया जहाँ....... वो है विहँग नीड़

शुक्रवार, 23 दिसंबर 2016

इसतरह से हमें वो भुलाने लगे। ख़ाक अपनी हवा में उड़ाने लगे। * हमने यूँ ही उन्हें बेवफ़ा जो कहा, आसमाँ अपने सर पे उठाने लगे। * नैन से नैन थोड़े मिले थे कि बस, आईने रोशनी को चिढ़ाने लगे। * आरज़ू जुस्तजू ख़्वाहिशें हसरतें स्वप्न नैनों में कुछ चहचहाने लगे। * आँधियाँ बारिशें बिजलियाँ आगयीं आशियाँ प्यार का जब बनाने लगे। * होंट पलकों पे उसने रक्खे जिस घडी, अक्स माजी के सब थरथराने लगे। * बेख्याली में झटकी जो जुल्फें ज़रा, सारे मौसम मुझे गुनगुनाने लगे। * 'मौली' जन्मों के तप का सिला ये मिला, बस मिले और फिर आज़माने लगे।

गुरुवार, 15 दिसंबर 2016

कागज़ का दर्द

कागज़ के दर्द का इल्म किसे यहाँ,सभी रहे मशगूल कलम घिसने में  बोझिल हुई किताबें बेदर्द हर्फ़ों से,मगर दिल न हुआ ख़ाली अबतक दर्द से।।               मौली

चाहत

मौसमों में चाहतों के रंग भरना चाहिये।
कुछ न कुछ ख़ामोशियों के दिल धड़कना चाहिये।

मेरा दिल कबतक हथेली पर मेरी तन्हा रहे,
तुझको भी तो जिस्म से बाहर निकलना चाहिए।

कैसे मानूं प्यार के इस खेल में माहिर है तू,
आँसुओं के ज़ख़्म से बिछड़न उबलना चाहिए।

रुसवाईयाँ,तन्हाईयाँ,दर्द,आहें और तड़प,
ऐसे मौसम में मुझे अब खुलके हँसना चाहिए।

सिसकियाँ तन्हाईयाँ रुस्वाईयाँ आहें तड़प,
ऐसे मौसम में मुझे कुछ खुलके हँसना चाहिए।

आज़माइश साज़िशें हैं मैं हूँ और क़िस्मत मिरी,
सोचती हूँ किसकी आँखों को छलकना चाहिए।
      मौली

बुधवार, 14 दिसंबर 2016

माज़ी

तुमने माज़ी के खुश्क शाखों को तोड़ दिया
लो हमने भी आँखों से सूखी नमी  गिरा दी।।
          मौली

मंगलवार, 13 दिसंबर 2016

दर्द

रुसवाइयों का मेला है दर्द भी अनोखा है
मुझको अब ये ज़िद है के डूबके उबरना है।।
           मौली

ज़िस्म को क्या मेरी रूह को न छू पायेगा मेरी पाकीज़गी की आंच में झुलस जायेगा बंदगी की एक रस्म तो अदा कर कभी ज़र्रे ज़र्रे में मुझको हरपल पायेगा।। मौली

सोमवार, 12 दिसंबर 2016

ज़िन्दगी

साया कब तन से जुदा हो पाया है मियां
कितनी ही क्यों न आंधियां पुरज़ोर रही हों।।
                  मौली

शनिवार, 10 दिसंबर 2016

अधूरे सपने

कैसी चाँद रात थी दिल पर अँधियारे गहराये थे। रातों की धडकन को जब भी गिनती सहमी साँसों से, बिछडन की चादर फैलाकर मौन अधर बैठाये थे । ऐसे में ही मेरे प्रियतम मुझसे मिलने आये थे। आतुर व्याकुल प्यास रखी थी क्वाँरे क्वाँरे नैनों में, रातों ने तेरी यादों के मौसम जब दहकाये थे। पेडों की झुरमुट से चंदा लुकाछुपी जब खेला था, टूटके हरसिंगार ने साये ख़ुशबू के बिखराये थे। पग में लाज की जंजीरें थी सामने थे प्रियतम तुम भी, क़समों वादों के बादल फिर आँखों में बौराये थे। अन्तस् की चंचल सरिता फिर आलिंगन को मचल उठी, सागर जैसे अपने बाज़ू तुमने जब फैलाये थे। पिहू पिहू में पीर सुलगती चातक क्रंदन करता था, आशाओं के सारे पलछिन साँसों ने बिसराये थे। मौली आधे रहे अधूरे सपने कुछ तेरे कुछ मेरे भी, नयन विदाई की बेला में "मौली" ये कह पाये थे।

शुक्रवार, 9 दिसंबर 2016

रात

सन्नाटों की धूल उड़ती है कहीं काली गहन रातों में तो कहीं यादों के अलाव जलते हैं सर्द रातों में।। २३.११.२०१६ मौली

रविवार, 4 दिसंबर 2016

वक्त की ये साजिश थी या के मेरी किस्मत
सब्र के पैमाने को  अभी और  छलकना है।।
           मौली