तुम्हारी खोज से क्लान्त हो आश्रय लिया जहाँ....... वो है विहँग नीड़

बुधवार, 8 जनवरी 2014

५१-




तन्हाई थी जागी-जागी सी कल रात
माहौल था जागा-जागा सा कल रात
चाँद भी था खामोश-उदास-गुमसुम सा
शायद गम में मेरे था शामिल कल रात।।

__ मौली

५०- अधूरे से ख्वाब





कल हवा के तेज थपेड़ों नें पूछा मुझसे
रेत में तुम क्या लिखती हो अकेले में
बेजार सी तुम क्यों दिखती हो
किस सोंच में गुमसुम रहती हो
इंतजार यूँ तुम किसका करती हो?

मैंनें हँस कर कहा _________
न पूछ किस्से मेरी इस खामोशी के
पहले सी अब न रही मैं
न रहा दर्द कोई बाकी अब
कुछ अधूरे से ख्वाब थे मेरे
कुछ एहसान उनके हैं चुकाने।
कुछ एहसान उनके हैं चुकाने।।

__ मौली

४९-





मुद्दतों बाद पूछती मेरी ही परछाईं मुझसे
अजनबी सी लगती क्यों कह दो मुझसे
आँखें कह गईं वो जो दिल में न था मेरे
खामोशी कह गई दास्ताँ दिल की मुझसे।।

__ मौली

४८-





बेवफ़ाई की तोहमत मुझपे ही लगाते हो क्यों
सरेआम इजहारे-मोहब्बत से कतराते हो क्यों।

__ मौली

४६-





आवाज दूँ तुझकोये तावोतवाँ कहाँ मुझमे
आबिदा हूँ, खुद अपनी ही सदा से डरती हूँ।

__ मौली

सोमवार, 6 जनवरी 2014

४५-





हर चन्द हम उनके खयालों में खोए हैं
खुद को हम इश्क के सागर में डुबोए हैं।

__ मौली

४४-





जीवन जहर भरा सागर अब कब अमृत घोलेंगें
तनहाई में हम रो लेंगें पर तेरे भेद न खोलेंगें।।

__ मौली

४३-




मेरा माहताब बादलों से निकलने को है बेताब
सितारों से कह दो झुका लें सर को अदब से।।

__ मौली

४२-





शामो-सहर यूँ ही भीगते रहिये
मेरे कसीदों की बारिश में जनाब
मेरी मौसमे-आरजू को बेदर्दी से
आप यूँ तो न ठुकराइये जनाब।।

__ मौली

४१-





कभी चाँद चमका ग्रहण में घिर कर
कभी सूर्य निकला बादलों में छिपकर
वक्त गम का यूँ ही नहीं गुजर जाता
हम आप ही गुजर जाते हैं अक्सर।।

__ मौली

बुधवार, 1 जनवरी 2014

४०-





बारिश.. की. एक. रूमानी. शाम
पैगाम. प्रेम. सँग आये मेरे बाम
गिरह सारे खोल हृदय के श्याम
बँध. गई प्रिये, तेरे प्रेम के नाम।।

__ मौली

३९-





चाँदनी रात को तारों को जमीं पर उतरते देखा है
चाँद को भी बादल के आगोश में सिमटते देखा है
रिमझिम-रिमझिम गिरती बारिश की फ़ुहारों में
खुद को कान्हा के प्रेम में डूबते-निखरते देखा है।।

__ मौली

३८-






कुछ अधूरे ख्वाब जमाने में छोड़ आई थी
जरा सी बात पे दिल उनका तोड़ आई थी
जाने क्या गुजरी होगी उनपे, इल्म है मुझे
एक कसम पे उनकी हर रस्म तोड़ आई थी।।

__ मौली