तुम्हारी खोज से क्लान्त हो आश्रय लिया जहाँ....... वो है विहँग नीड़

बुधवार, 8 जनवरी 2014

५०- अधूरे से ख्वाब





कल हवा के तेज थपेड़ों नें पूछा मुझसे
रेत में तुम क्या लिखती हो अकेले में
बेजार सी तुम क्यों दिखती हो
किस सोंच में गुमसुम रहती हो
इंतजार यूँ तुम किसका करती हो?

मैंनें हँस कर कहा _________
न पूछ किस्से मेरी इस खामोशी के
पहले सी अब न रही मैं
न रहा दर्द कोई बाकी अब
कुछ अधूरे से ख्वाब थे मेरे
कुछ एहसान उनके हैं चुकाने।
कुछ एहसान उनके हैं चुकाने।।

__ मौली

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