कुछ इस तरह इश्क किया हमने.... वो
चाहे न चाहे हमे पर हमने तो चाहा है
उन्हें दरो दीवार में उनकी यादों के साथ
खुद को कैद किया है हमने इन्तहां प्यार
की हद से गुज़र जाने तलक क्या जानूँ
मेहरबां मुझ तक आयें न आयें अभी तो
मशगूल वो महफ़िलों में मगर इक रोज़
उन्हें दरकार मेरे पहलू की होगी मेरी
चाहत और बढ़ी जबसे जाना हमने कि
उन्हें मेरा होना नही है कुबूल कितने रंग
फैले मेरे चारो इंद्रधनुष को ही मचलुं
क्यों रोज़ अब तो ये ज़िद है और जंग
ईश्वर से गर मिलाया हमें तो बिछडन
कैसे मंज़ूर हो हमें यायावर से भटक रहे
वो मृगतृष्णा की खोज में.... आखिर
इक दिन लौटोगे सनम मेरे प्यार के मोह
में कहते थे वो कि रिश्ते निभाता हूँ मैं
हंस कर बोली मैं, के रिश्ते निभाना नही आपके वश में।।
मौली