तुम्हारी खोज से क्लान्त हो आश्रय लिया जहाँ....... वो है विहँग नीड़

मंगलवार, 8 मई 2018

मौली

चाहतों के मौसम का क्या हसीं मंज़र है हर तरफ है ख़ामोशी धड़कनों का शोर है।। चंद्रमा के हाला सा बांहों का तेरे घेरा है इसमें ही बिखर मुझको इसमें ही सिमटना है।। खेल ये इश्क का जिसने भी खेला है आंसूं और बिछड़न का ज़ख्म उसने पाया है।। रुसवाइयों का मेला है दर्द भी अनोखा है मुझको अब ये ज़िद है के डूबके उबरना है।। वक्त की ये साजिश थी या के मेरी किस्मत सब्र के पैमाने को अभी और छलकना है।। खारों की इक सेज़ को फूलों से सजाया था रंजिशों के दौर में रहनुमा तलाशा था।। इंद्रधनुष के रंगों से कोरा मन भिगोया था रात की स्याही ने उसपे भी डेरा डाला था।। इक हंसीं के बदले में क्या खूब नेमत है पाई 'मौली' जन्मों के तप का सिला ये मिला, बस मिले और फिर आज़माने लगे।

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