तुम्हारी खोज से क्लान्त हो आश्रय लिया जहाँ....... वो है विहँग नीड़

बुधवार, 1 अप्रैल 2026

ग़र रात चाँद बेचने पे आमादा होती,

*ग़र रात चाँद बेचने पे आमादा होती*
*तो हर रात अमावस होती ।।*
                 ।। मौली ।

बुधवार, 31 दिसंबर 2025

शून्य मन शून्य ह्रदय,युगों से हर क्षण रहा रीता न मिला पुरुषोत्तम कोई, न मिला कोई सार गीताछल कपट,विश्वास घातकता का नित रहा नया प्रपंचरावण ने कुचक्र रचकर किया जानकी का हरणएक अहंकारी दूजा मर्यादित दोनों को क्या सूझी सब जानकर भी सती सीता के सतीत्व का प्रमाण मांगाकिसको कोसती वो बेचारी किसपे करती विलापकलुषित मानसिकता को सहकर मैया, धरित्री के गर्भ में समाईदुस्साशन हो दुर्योधन हो .......या हो पंच पांडव एक से बढ़कर एक धनुर्धर और महारथी कहते थे उनकोएक लगाये दांव पांचाली का एक करे चीर हरणक्या गौरवशाली गाथा है उनकी,मैं करूँ इनका स्मरण?पौरुष दिखलाने को अनगिनत विविध विकल्प थेक्यों नारी ही बनी माध्यम दिखलाने को उनपे पराक्रमअब न बनेगी सीता,द्रौपदी,न बनेगी अहिल्या कोई न बनेगी शिला कोई नारी, न देगी अग्नि परीक्षा कौन सत्यवान है यहाँ और कौन रामकृष्ण परमहंसफिर भी चाहे हर बावला सावित्री सम सती नारीन अस्मत की,न मर्यादा की कर सका कोई संरक्षणक्षण भंगुर की देह लोलुपता के नित नव प्रसंगप्रेम की महिमा गा गाकर सुनाता रहा वो अलमस्त मलंगपर क्षण भंगुर की देह लोलुपता के नित होते रहे नव प्रसंगमौली

गुरुवार, 22 जून 2023

अनपढ़ नैन

अनपढ़ थे मेरे नैन जो तेरे आवारा नैनों की भाषा न पढ़ सके
बंजारा था दिल तेरा किसी एक जगह ठिकाना न बना सका।।
            मौली

बुधवार, 29 मई 2019

तपिश

वफ़ा की पनाह में पिघल रहे थे दो जिस्म सौंधे से
एक आरज़ू की कशिश में दूजा वक्त की तपिश में.....
                              मौली

बुधवार, 6 मार्च 2019

सूफियाना ग़ज़ल

एक सूफी ग़ज़ल मुझे तोहमतें लगा कर, न करो कोई बहाना मेरी ज़ात है रूहानी, मेरा इश्क़ सूफ़ियाना किसी शख़्स को कभी भी, कोई ठेस न लगाई मगर मुझ पे तो सितम ही, करे बे-वजह ज़माना ये लिबास-ए-ज़िन्दगी में, ये बदन है ख़ाक उसकी मेरी सुफ़ियाना मिट्टी, जहां चाहो तुम उड़ाना किसी एक को अगर कुछ, मेरी ज़ात को दिखाया तो ये राज़ को ख़ुदाया, कहीं और न बताना मेरे छाले ज़ख़्म कब हैं, ये तो फूल बन रहे हैं मेरे क़दमों को ज़रा तुम, अभी और आज़माना तुझे ढ़ूढ़ने की ख़ातिर, कहीं और जाऊं क्यों कर मेरा दिल ही तेरा घर है, यहीं है तेरा ठिकाना यहां दोस्त और दुश्मन, सभी "मौली" के लिए हैं ये जहां है मेरा अपना, यहां सबको है निभाना

रविवार, 3 मार्च 2019

प्रेम

प्रेम प्रेम जिस्मानी ? नही रे रूहानी प्रेम निराधार प्रेम का क्या स्वरूप प्रेम का कैसा पैमाना प्रेम छलकता तो रिश्तों को निकट लाता प्रेम उम्र का कब, रूह का है गुलाम प्रेम की पिपासा उस चातक सम, स्वाति की एक बून्द जिसकी अभिलाषा प्रेम आरोह अवरोह नही न ही अवरोध प्रेम तीव्र सप्तक प्रेम है मर्यादित तो कहीं प्रेम उन्मुक्त खग विहंग सी प्रेम अविरल प्रेम आस्था प्रेम है विश्वास प्रेम में सृष्टि सृष्टि में प्रेम प्रेम अलौकिक प्रेम कबीर तो कहीं मीरा प्रेम है सूफी पर यायावर नही प्रेम ठहराव पर भटकन नही प्रेम विष पर अमृत सा प्रेम उन्मुक्त तो प्रेम नीड़ भी प्रेम है अशोक सीता जिसकी शरणार्थी प्रेम रुद्र प्रेम वेद,वेदांत और उपनिषद भी प्रेम सार है सारथी भी प्रेम प्रेम है जिज्ञासा अविराम नही कभी प्रेम माघ कभी जयेष्ठ सी कभी सावन कभी फागुन,बसन्त प्रेम मेघ मल्हार सा कभी राग भैरव सा प्रेम आच्छादित प्रेम भग्न नही प्रेम बहता नीर सा प्रेम रमता जोगी सा प्रेम सागर सा गम्भीर या कहीं मरुस्थल की मृगतृष्णा प्रेम कहीं प्लावित धरती तो कहीं बंजर मिट्टी सी प्रेम के कई रूप कई स्वरूप हा मानव ! बिन प्रेम क्या तेरी कथा? कैसी तेरी व्यथा? कैसी तेरी गाथा? मौली