तुम्हारी खोज से क्लान्त हो आश्रय लिया जहाँ....... वो है विहँग नीड़

बुधवार, 31 दिसंबर 2025

शून्य मन शून्य ह्रदय,युगों से हर क्षण रहा रीता न मिला पुरुषोत्तम कोई, न मिला कोई सार गीताछल कपट,विश्वास घातकता का नित रहा नया प्रपंचरावण ने कुचक्र रचकर किया जानकी का हरणएक अहंकारी दूजा मर्यादित दोनों को क्या सूझी सब जानकर भी सती सीता के सतीत्व का प्रमाण मांगाकिसको कोसती वो बेचारी किसपे करती विलापकलुषित मानसिकता को सहकर मैया, धरित्री के गर्भ में समाईदुस्साशन हो दुर्योधन हो .......या हो पंच पांडव एक से बढ़कर एक धनुर्धर और महारथी कहते थे उनकोएक लगाये दांव पांचाली का एक करे चीर हरणक्या गौरवशाली गाथा है उनकी,मैं करूँ इनका स्मरण?पौरुष दिखलाने को अनगिनत विविध विकल्प थेक्यों नारी ही बनी माध्यम दिखलाने को उनपे पराक्रमअब न बनेगी सीता,द्रौपदी,न बनेगी अहिल्या कोई न बनेगी शिला कोई नारी, न देगी अग्नि परीक्षा कौन सत्यवान है यहाँ और कौन रामकृष्ण परमहंसफिर भी चाहे हर बावला सावित्री सम सती नारीन अस्मत की,न मर्यादा की कर सका कोई संरक्षणक्षण भंगुर की देह लोलुपता के नित नव प्रसंगप्रेम की महिमा गा गाकर सुनाता रहा वो अलमस्त मलंगपर क्षण भंगुर की देह लोलुपता के नित होते रहे नव प्रसंगमौली

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