तुम्हारी खोज से क्लान्त हो आश्रय लिया जहाँ....... वो है विहँग नीड़

रविवार, 31 जुलाई 2016

आईना

खूब चलन इस दुनियां का,देखते हैं आईना खुद     
और खामियां दूसरों की गिनातें रहतें हैं।।
           मौली                          

जब शब्द शोर करने लगे
तब खामोशियाँ बोलती हैं।
        मौली

आवारा बादल

ऐ बादल, तू तो है आवारा और तेरी बारिश की बुँदे यायावर
न जाने कब और कहाँ ये उश्रृंखल हो उमड़ घुमड़ कर बरसें।।
   मौली

गुरुवार, 28 जुलाई 2016

भ्रमित मन

अल्हड़ नदी सा क्यों यूँ अनवरत बहता जाये ये मन
भ्रमित दिशाहारा सा किस ओर बहता जाये ये मन
सावन की रिमझिम में ये और उफ़न उफ़न सा जाये
किनारे की आस संजोये उन्मादित सा बहता जाये ये मन।।
           मौली

बुधवार, 27 जुलाई 2016

अतीत

मुझको अतीत कर खुद वर्तमान और भविष्य में क्या खूब रम गये
इतिहास के पन्नों पे काले अक्षर सा बिलखता मुझे तन्हा छोड़ आये।।
   मौली

सोमवार, 25 जुलाई 2016

बेशकीमती

यूँ सरेराह खुद को बेज़ार न करना
तूफानों से डरकर कश्ती न छोड़ना
तुझे पाकर ही तो मैं बेशकीमती हुई
हारकर फिर से मुझे गरीब न करना।।
       मौली

रविवार, 24 जुलाई 2016

~ज़र्द रिश्ता~

जर्जर दिल की ड्योढ़ी पे वो फिर साँझ का दिया जला गया
आया था चुपके से मिलने मगर अतीत रौशन कर गया
छोटी छोटी मीठी रंजिशों को ज़र्द रात बना गया
गमों की तपती रेत पे यादों की गीली चादर ओढ़ा गया
मुझे भी सब्र की नींद आ गयी सोचकर के,उसे सुकूँ आ गया
बीते हसीं लम्हों का कफ़न ओढ़े फिर सैलाबों का सावन आ गया।।
    मौली

रविवार, 17 जुलाई 2016

राष्ट्र प्रेम

वीरों की कुर्बानियों का यह देश है इस देश की धरित्री का जो सन्देश है वीरांगनाओं के माथे का अभिषेक है वैमनस्यता का ह्रास,प्रेम का समावेश है सब धर्मों का सम्मान यहाँ धृष्टता का क्षमादान नही कहती हूँ हर दिन हर रात हिन्द की मैं शेरनी महिषासुरों की हूँ नाशिनी जयहिन्द का उदघोष जहां कण कण में वयाप्त है बलिदानों की पवित्र भूमि हम सबका अभिमान है मेरा भारत महान है हम भारत की संतान हैं हिन्द की हम शान है हिन्द हमारी आन है आओ मिलकर प्रण लें हम आतंकवाद को निर्मूल करें "मैं"के अंधकार खोल से निकल हक़ीकत के सूर्य का स्वागत करें दुष्टों का नाश कर मानवता का आह्वान करें धरित्री के दुलारों तुमको माँ का क़र्ज़ चुकाना है रक्तरंजित हुई वसुंधरा को फिर से शष्य श्यामला बनाना है।। मौली वन्दे मातरम

गुरुवार, 14 जुलाई 2016

प्यार की इन्तहां

कुछ इस तरह इश्क किया हमने.... वो चाहे न चाहे हमे पर हमने तो चाहा है उन्हें दरो दीवार में उनकी यादों के साथ खुद को कैद किया है हमने इन्तहां प्यार की हद से गुज़र जाने तलक क्या जानूँ मेहरबां मुझ तक आयें न आयें अभी तो मशगूल वो महफ़िलों में मगर इक रोज़ उन्हें दरकार मेरे पहलू की होगी मेरी चाहत और बढ़ी जबसे जाना हमने कि उन्हें मेरा होना नही है कुबूल कितने रंग फैले मेरे चारो इंद्रधनुष को ही मचलुं क्यों रोज़ अब तो ये ज़िद है और जंग ईश्वर से गर मिलाया हमे तो बिछडन कैसे मंज़ूर हो हमें बंजारों से भटक रहे वो मृगतृष्णा की खोज में.... आखिर इक दिन लौटोगे सनम मेरे प्यार के मोह में कहते थे वो कि रिश्ते निभाते हैं वो हंस कर बोली मैं, के रिश्ते निभाना नही उनके वश में।। मौली

सोमवार, 11 जुलाई 2016

तेरे इश्क पे ऐतबार है हमे मगर
अपनी किस्मत पे हमे यकीं नही।।
           मौली

तमन्नाओं की शमा जलती रही
खवाहिशों की बोली लगती रही
पैमाने सब्र के रोज़ छलकते रहे
अमावस की रात और गहराती रही।।
              मौली

गुरुवार, 7 जुलाई 2016

वफ़ा

हमारे दरमियाँ ये कौन सा जज़्बा रह गया

जो न दोस्त रहा न ही दुश्मन रह गया

नफरतों के तूफां का कहर पुरज़ोर रहा

सैलाब भी वफ़ा के आशियाने बहा ले गया।।
              मौली

शनिवार, 2 जुलाई 2016

बाँहो का हाला

तेरे ही रंग में रंगना चाहूँ मैं पिया तेरे प्रेम का ही सोलह श्रृंगार मैं करूँ तेरे ही ह्रदय के तरंगों पे नृत्य मैं करूँ तेरी गीत,तेरी ग़ज़ल,तेरी ही कविता की शब्द "मैं" तेरे ही बांहों के हाला में कैद होना चाहुँ मैं तुझे ही चाहुँ तुझसे चुराकर तुझमे ही समाना चाहूँ मैं आराध्य भी तू,दुआ भी तू,तू ही पूण्य का फल तू ही आदि,तू ही अंत दूजा न कोई मेरे संग मैं चातक जन्मों की प्यासी स्वाति की ही हूँ अभिलाषी प्रिय आलिंगन के मोहपाश में बंधने को हूँ आतुर मैं बन गुजरिया राह तकूँ मैं तू क्यों न समझे पीर जिया की.... किस विध जतन करूँ पिया मैं,तेरे दर्शन पाऊँ तुझमें ही रच बस जाऊँ तेरे ही रंग रंगकर मैं अधरों पे सज जाऊँ..... बन मुरली की धुन कृष्ण तरंगित मैं हो जाऊँ.... मौली