जर्जर दिल की ड्योढ़ी पे वो फिर साँझ का दिया जला गया
आया था चुपके से मिलने मगर अतीत रौशन कर गया
छोटी छोटी मीठी रंजिशों को ज़र्द रात बना गया
गमों की तपती रेत पे यादों की गीली चादर ओढ़ा गया
मुझे भी सब्र की नींद आ गयी सोचकर के,उसे सुकूँ आ गया
बीते हसीं लम्हों का कफ़न ओढ़े फिर सैलाबों का सावन आ गया।।
मौली
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