तुम्हारी खोज से क्लान्त हो आश्रय लिया जहाँ....... वो है विहँग नीड़

गुरुवार, 31 अक्टूबर 2013

३- प्रेम





विरह वेदना से मर्माहत मैं
पल-पल बाट जोहती रहती हूँ
राह निहारत थक गयीं अँखियाँ
नगर-हाट खोजती रहती हूँ........

रो-रो धुला अँखियन का कजरा
कुछ भी अब भाये न मोहे
रूप-रँग सब फ़ीका पड़ गया
सोलह-सिंगार भी भाये न मोहे
तुम सँग नेह लगी जब से
सखी-सहेली भाये न मोहे
फ़ीकी पड़ गई शोख चुनरिया
तड़पत जियरा तुम बिन सँवरिया
उमड़-घुमड़ कर बदरा बैरन
रही सताती जैसे हो सौतन
माटी की हो मूरत क्या तुम
मेरी व्यथा से अनजान सखा तुम
सखी-सहेली व्यंग बाण चलाती
जोगन-जोगन मुझे बुलाती......

कान्हा-कान्हा रटते-रटते
मैं जोगन बन जाऊँगी
कान्हा-कान्हा रटते-रटते
शायद संसार तज जाऊँगी
सही न जाये अब विरह की पीड़ा
आओ मोहे उबारो खेलें फ़िर जल-क्रीड़ा
फ़ीकी परी चुनरिया रँग जा आके
रँगरेज मेरे.......... रँगरेज मेरे..........

___ मौली

मंगलवार, 29 अक्टूबर 2013

२- कठपुतली





तमाशा दिखाती कठपुतली ने
पूछा हमसे इशारों से...

क्या अन्तर है तुझमें और मुझमें....
मैं काठ की पुतली हूँ
मालिक मुझे नचाता है
सरदी-गरमी, सावन भादों,
बँजारों सा भटकाता है
चँद पैसों के खातिर
नाच हमसे वो नचवाता है,
हमारा नृत्य देख
तुम सब लुत्फ़ उठाते हो....

हाड़-मास के तुम पुतले
हमसे भी गये-गुजरे हो
तुम तो बिना धागों के ही
खूब तमाशे दिखाते हो
मानवता की चादर ओढ़े
तुम रोज बर्बरता करते हो
भाई-चारे को छोड़
पीठ में खँजर भोंकते हो
रक्त-रँजित लाशों पर
अपना आशियाना बनाते हो
हैवानियत की पराकाष्ठा पार कर
वहशी दरिन्दे बन जाते हो....

अग्यानता से परिपूर्ण तुम
खुद को शासक कहलाते हो....
देख तेरी उद्दंडता
हम शर्मिन्दा हो जाते हैं....

हे ईश्वर ! तेरे हाड़-मास के पुतलों से
हम कठपुतली अच्छे हैं
खेल तमाशा करते हैं
खुशियाँ हम फ़ैलाते हैं
कठपुतली हैं हम
खेल-तमाशे दिखलाते हैं।।

_________________________ मौली

रविवार, 27 अक्टूबर 2013

१- इस रात की सुबह नहीं





सदियाँ गुजर गई उस सुबह की तलाश में
गहरी, काली भयावह रात की आदत सी हो गई मुझे,
सारी कायनात जब रात के आगोश में कैद
गहरी तृप्त निद्रा में लिप्त होती,
तो कहीं दूर...........................
एक अकेली मैं......................
कोसों दूर नींद के उस आनन्द से महरूम
सहमी, सिमटी, सकुचाई अपने ही अवसाद से खुद को ढ़ाँकती,
आँसुओं के चादर में लिपटी
ग्रीष्म, वर्षा, शीत के थपेड़ों से महफ़ूज़ रखती,
कभी उस सुबह के सपने सहेजती...............
.......... जो खुले आँखों से देखती,
एक व्यभिचारी की कैद में,
छटपटाती, तड़पती, गुहारती अपने बाबुल को,
दम तोड़ती उस सुबह की आस में,
रुसवाई के डर से भयभीत..............................

रात है कि खत्म होती नहीं,
दर्द है कि थमता नहीं,
साँस भी अब दम तोड़ रही
आत्मा भी पिंजर छोड़ रही
खुली आँखें अब हैं पथ पर लगी हुई,
आ जा कि अब रैन ढ़ली,
तेरे कदमों की आहट मिली कहीं
कि अब राह न भूल बटोही,
आ जा कि अंतिम है बेला,
आगोश में लेकर सुला दे मुझे चिर निद्रा में,
जी लूँ पल दो पल मेरे हमराज
कि शानों पे सिर रख कर तेरे
दम ले लूँ घड़ी दो घड़ी
उखड़ती साँसें है अब बेवफ़ाई पर आमादा,
आ जा हरजाई तू क्यों है खौफ़ज़दा,
दुनिया के रस्मो-रिवाज की जँजीरों में है जकड़ा,
तू न आ पायेगा आखिर,
कि रैन ढ़ली, ले चली मैं अब
फ़िर तलाश में उस रात की
जिस रात की सुबह नहीं,
शायद इस रात की सुबह नही
........ इस रात की सुबह नहीं।।

_____________ मौली