तुम्हारी खोज से क्लान्त हो आश्रय लिया जहाँ....... वो है विहँग नीड़

रविवार, 27 अक्टूबर 2013

१- इस रात की सुबह नहीं





सदियाँ गुजर गई उस सुबह की तलाश में
गहरी, काली भयावह रात की आदत सी हो गई मुझे,
सारी कायनात जब रात के आगोश में कैद
गहरी तृप्त निद्रा में लिप्त होती,
तो कहीं दूर...........................
एक अकेली मैं......................
कोसों दूर नींद के उस आनन्द से महरूम
सहमी, सिमटी, सकुचाई अपने ही अवसाद से खुद को ढ़ाँकती,
आँसुओं के चादर में लिपटी
ग्रीष्म, वर्षा, शीत के थपेड़ों से महफ़ूज़ रखती,
कभी उस सुबह के सपने सहेजती...............
.......... जो खुले आँखों से देखती,
एक व्यभिचारी की कैद में,
छटपटाती, तड़पती, गुहारती अपने बाबुल को,
दम तोड़ती उस सुबह की आस में,
रुसवाई के डर से भयभीत..............................

रात है कि खत्म होती नहीं,
दर्द है कि थमता नहीं,
साँस भी अब दम तोड़ रही
आत्मा भी पिंजर छोड़ रही
खुली आँखें अब हैं पथ पर लगी हुई,
आ जा कि अब रैन ढ़ली,
तेरे कदमों की आहट मिली कहीं
कि अब राह न भूल बटोही,
आ जा कि अंतिम है बेला,
आगोश में लेकर सुला दे मुझे चिर निद्रा में,
जी लूँ पल दो पल मेरे हमराज
कि शानों पे सिर रख कर तेरे
दम ले लूँ घड़ी दो घड़ी
उखड़ती साँसें है अब बेवफ़ाई पर आमादा,
आ जा हरजाई तू क्यों है खौफ़ज़दा,
दुनिया के रस्मो-रिवाज की जँजीरों में है जकड़ा,
तू न आ पायेगा आखिर,
कि रैन ढ़ली, ले चली मैं अब
फ़िर तलाश में उस रात की
जिस रात की सुबह नहीं,
शायद इस रात की सुबह नही
........ इस रात की सुबह नहीं।।

_____________ मौली


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