तुम्हारी खोज से क्लान्त हो आश्रय लिया जहाँ....... वो है विहँग नीड़

गुरुवार, 31 अक्टूबर 2013

३- प्रेम





विरह वेदना से मर्माहत मैं
पल-पल बाट जोहती रहती हूँ
राह निहारत थक गयीं अँखियाँ
नगर-हाट खोजती रहती हूँ........

रो-रो धुला अँखियन का कजरा
कुछ भी अब भाये न मोहे
रूप-रँग सब फ़ीका पड़ गया
सोलह-सिंगार भी भाये न मोहे
तुम सँग नेह लगी जब से
सखी-सहेली भाये न मोहे
फ़ीकी पड़ गई शोख चुनरिया
तड़पत जियरा तुम बिन सँवरिया
उमड़-घुमड़ कर बदरा बैरन
रही सताती जैसे हो सौतन
माटी की हो मूरत क्या तुम
मेरी व्यथा से अनजान सखा तुम
सखी-सहेली व्यंग बाण चलाती
जोगन-जोगन मुझे बुलाती......

कान्हा-कान्हा रटते-रटते
मैं जोगन बन जाऊँगी
कान्हा-कान्हा रटते-रटते
शायद संसार तज जाऊँगी
सही न जाये अब विरह की पीड़ा
आओ मोहे उबारो खेलें फ़िर जल-क्रीड़ा
फ़ीकी परी चुनरिया रँग जा आके
रँगरेज मेरे.......... रँगरेज मेरे..........

___ मौली

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