आज मेरी कलम ने भी धमकी दी,
मेरा साथ छोड़ने की,
मैं अवाक, हतप्रभ सी कलम को देखती रह गयी,
मैंनें प्रश्नवाचक नजरों से कलम को देखा, तो
कलम ने कहा --
क्या तुम विदित हो अपने ऊपर होते अत्याचार से,
तुम्हे आभास नहीं अपने बिगड़ते सम्बन्धो का,
मेरे-तेरे के मध्य रिश्तों ने तुझे हताहत किया,
मूढ़मति और मूक-बधिर बन देखती रही इसे,
इस तू-तू, मैं-मैं के मंजर से
हृदय विदीर्ण हुआ,
आत्मा अतिंम साँसे लेने लगी,
आँखों से अविरल अश्रुधार बह निकली।
यहाँ तक फ़िर भी ठीक था ---
जब तक तेरे होठों से
एक आह और सिसकी भी न निकली।
तुझमें होगा धैर्य, संयम, प्रेम, सद्भावना,
पर मैं..?
मुझे तो तूने प्रेम, विरह,
देशप्रेम रिश्तों की मधुरता को
व्यक्त करने का जरिया बनाया था,
मैंने न जाना कोई दूसरा दर्द
तेरी पीड़ा से भी अनजान न थी मैं
पर आज मैनें बगावत की है,
रिश्तों ने घायल किया है
तेरी आत्मा और लेखनी को
तेरी सरलता और सहजता को
उन छलावे रिश्तों को
अब न अपनाने दूँगीं तुझे
बस, बहुत हो चुका
उठ, आज रच एक नई रचना
"नारी है संयम, धैर्य और प्रेम का संगम,
नारी है जननी, नारी है शक्ति, नारी है ममत्व का प्रतीक,"
सम्मान नहीं है नारी का
जिस धरती, देश और समाज और घर में
विनाश ही विनाश है वहाँ
नहीं है वास देवताओं का भी वहाँ।।
__ मौली

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें