तुम्हारी खोज से क्लान्त हो आश्रय लिया जहाँ....... वो है विहँग नीड़
सोमवार, 13 जुलाई 2015
रविवार, 5 जुलाई 2015
अलविदा जिंदगी !!
रेत मानिंद दारुण वेदना से और मुझे
फिसलती जा रही दे दिया मार्मिक अंतर्द्वंद?
पल पल तुम्हारी नहीं नहीं भाई मुझे मुक्त करो
जिंदगी....ख़त्म इस पीड़ा से...नहीं सह पा रही
होने को है फिर मैं भी तुम्हारी ही भांति
एक रिश्ता असहनीय इस दर्द को...
मौत को संग लेकर इतने नाराज़ कब हुये तुम?
खड़ा देहलीज पे जो मुझसे मिलना भी गवारा न किया.
रुको जरा ठहरो बहुत कुछ कहना
मेरी करुण क्रंदन अभी शेष है...
का तो मान रक्खो तुम्हे क्या हक़ कि सारे बंधन
भाई का स्नेह..कभी दोस्त यूँ तोड़ चले
सा भाव कभी पिता सा दुलार नहीं भाई कभी नहीं कदापि नहीं
सारे अहसास दिला ये रिश्ता अटूट है अटूट है ये रिश्ता
कहाँ चल दिये.. बंधी है तुम्हारी कलाई में "मौली"
इतने निष्ठुर कब हुए तो कैसे जा पाओगे
तुमने वचन दिया था न दो उत्तर आज मुझे
सारी उम्र करोगे मेरी रक्षा दो भाईदूज का नेग
कितनी बेबस हूँ आज चाहिए यही सौगात ...उठो
जिंदगी मांगूं दो मेरा नेग... उठो भाई उठो...
या तुम्हारी मुक्ति ?
खुद लड़ रहे मृत्यु की
~~~मौली~~~
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