तुम्हारी खोज से क्लान्त हो आश्रय लिया जहाँ....... वो है विहँग नीड़

गुरुवार, 9 जुलाई 2015

                                                                मेरी कविता के कुछ अंश



यायावर सी भटकती नदी,
मिलने को तत्पर समुन्दर से
कितने उतार चढ़ाव पारकर
चली मिलने अपने प्रिय से
प्रेम की पराकाष्ठा तो देखो
मीठापन अपना तज कर चली
खारापन अपनाने अपने प्रिय की
प्रकृति का ये खूबसूरत सन्देश
हा मानव! तूने ही न अपनाया।।
~~मौली~~

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