तमाशा दिखाती कठपुतली ने
पूछा हमसे इशारों से...
क्या अन्तर है तुझमें और मुझमें....
मैं काठ की पुतली हूँ
मालिक मुझे नचाता है
सरदी-गरमी, सावन भादों,
बँजारों सा भटकाता है
चँद पैसों के खातिर
नाच हमसे वो नचवाता है,
हमारा नृत्य देख
तुम सब लुत्फ़ उठाते हो....
हाड़-मास के तुम पुतले
हमसे भी गये-गुजरे हो
तुम तो बिना धागों के ही
खूब तमाशे दिखाते हो
मानवता की चादर ओढ़े
तुम रोज बर्बरता करते हो
भाई-चारे को छोड़
पीठ में खँजर भोंकते हो
रक्त-रँजित लाशों पर
अपना आशियाना बनाते हो
हैवानियत की पराकाष्ठा पार कर
वहशी दरिन्दे बन जाते हो....
अग्यानता से परिपूर्ण तुम
खुद को शासक कहलाते हो....
देख तेरी उद्दंडता
हम शर्मिन्दा हो जाते हैं....
हे ईश्वर ! तेरे हाड़-मास के पुतलों से
हम कठपुतली अच्छे हैं
खेल तमाशा करते हैं
खुशियाँ हम फ़ैलाते हैं
कठपुतली हैं हम
खेल-तमाशे दिखलाते हैं।।
_________________________ मौली

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