तुम्हारी खोज से क्लान्त हो आश्रय लिया जहाँ....... वो है विहँग नीड़

शनिवार, 2 जुलाई 2016

बाँहो का हाला

तेरे ही रंग में रंगना चाहूँ मैं पिया तेरे प्रेम का ही सोलह श्रृंगार मैं करूँ तेरे ही ह्रदय के तरंगों पे नृत्य मैं करूँ तेरी गीत,तेरी ग़ज़ल,तेरी ही कविता की शब्द "मैं" तेरे ही बांहों के हाला में कैद होना चाहुँ मैं तुझे ही चाहुँ तुझसे चुराकर तुझमे ही समाना चाहूँ मैं आराध्य भी तू,दुआ भी तू,तू ही पूण्य का फल तू ही आदि,तू ही अंत दूजा न कोई मेरे संग मैं चातक जन्मों की प्यासी स्वाति की ही हूँ अभिलाषी प्रिय आलिंगन के मोहपाश में बंधने को हूँ आतुर मैं बन गुजरिया राह तकूँ मैं तू क्यों न समझे पीर जिया की.... किस विध जतन करूँ पिया मैं,तेरे दर्शन पाऊँ तुझमें ही रच बस जाऊँ तेरे ही रंग रंगकर मैं अधरों पे सज जाऊँ..... बन मुरली की धुन कृष्ण तरंगित मैं हो जाऊँ.... मौली

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