हमारे दरमियाँ ये कौन सा जज़्बा रह गया
जो न दोस्त रहा न ही दुश्मन रह गया
नफरतों के तूफां का कहर पुरज़ोर रहा
सैलाब भी वफ़ा के आशियाने बहा ले गया।। मौली
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