तुम्हारी खोज से क्लान्त हो आश्रय लिया जहाँ....... वो है विहँग नीड़

बुधवार, 6 मार्च 2019

सूफियाना ग़ज़ल

एक सूफी ग़ज़ल मुझे तोहमतें लगा कर, न करो कोई बहाना मेरी ज़ात है रूहानी, मेरा इश्क़ सूफ़ियाना किसी शख़्स को कभी भी, कोई ठेस न लगाई मगर मुझ पे तो सितम ही, करे बे-वजह ज़माना ये लिबास-ए-ज़िन्दगी में, ये बदन है ख़ाक उसकी मेरी सुफ़ियाना मिट्टी, जहां चाहो तुम उड़ाना किसी एक को अगर कुछ, मेरी ज़ात को दिखाया तो ये राज़ को ख़ुदाया, कहीं और न बताना मेरे छाले ज़ख़्म कब हैं, ये तो फूल बन रहे हैं मेरे क़दमों को ज़रा तुम, अभी और आज़माना तुझे ढ़ूढ़ने की ख़ातिर, कहीं और जाऊं क्यों कर मेरा दिल ही तेरा घर है, यहीं है तेरा ठिकाना यहां दोस्त और दुश्मन, सभी "मौली" के लिए हैं ये जहां है मेरा अपना, यहां सबको है निभाना

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें