अभी लिखी एक नज़्म....
----------------------------
हम दो पाखी एक डाल के
उड़ना चाहे पर उड़ न सके
भाव है बहुत पर शब्द नही
कश्ती तो है पर साहिल नही
बात हिया की होंठों दबी है
पिय बिन अब तो जी न लगे
रात है लम्बी सुबह न आई
बिरहा की तपिश में जलजल जाऊं
कैसे उन्हें मैं भेजूं हाल जिया की
समझे न वो मेरे दिल की अगन को
तपती सांस है होंठ ख़ुश्क हैं
सहमी नब्ज़ है आंख है बोझिल
सुन लो सजन मेरी बेदम धड़कन
सांझ ढले तक आ जाओ तुम......
सांझ ढले तक आ जाओ तुम.....
मौली
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें