क्यों चले आते हो
दबे दबे पांवों से
मेरे नज़्मों के आंगन में
ज़ज्बातों के डेरे है
अरमानों के रेलें हैं
मेरे नज़्मों के आंगन में
कितने गिरह खुले हैं
कितने अभी बाकि है
मेरे नज़्मों के आंगन में
रंजिशों के मेले हैं
बन्दिशों के घेरे हैं
मेरे नज़्मों के आंगन में
रुमानियत की चाहत है
हैवानियत की सांकल है
मेरे नज़्मों के आंगन में
मौली
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