तुम्हारी खोज से क्लान्त हो आश्रय लिया जहाँ....... वो है विहँग नीड़

शनिवार, 10 दिसंबर 2016

अधूरे सपने

कैसी चाँद रात थी दिल पर अँधियारे गहराये थे। रातों की धडकन को जब भी गिनती सहमी साँसों से, बिछडन की चादर फैलाकर मौन अधर बैठाये थे । ऐसे में ही मेरे प्रियतम मुझसे मिलने आये थे। आतुर व्याकुल प्यास रखी थी क्वाँरे क्वाँरे नैनों में, रातों ने तेरी यादों के मौसम जब दहकाये थे। पेडों की झुरमुट से चंदा लुकाछुपी जब खेला था, टूटके हरसिंगार ने साये ख़ुशबू के बिखराये थे। पग में लाज की जंजीरें थी सामने थे प्रियतम तुम भी, क़समों वादों के बादल फिर आँखों में बौराये थे। अन्तस् की चंचल सरिता फिर आलिंगन को मचल उठी, सागर जैसे अपने बाज़ू तुमने जब फैलाये थे। पिहू पिहू में पीर सुलगती चातक क्रंदन करता था, आशाओं के सारे पलछिन साँसों ने बिसराये थे। मौली आधे रहे अधूरे सपने कुछ तेरे कुछ मेरे भी, नयन विदाई की बेला में "मौली" ये कह पाये थे।

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