तुम्हारी खोज से क्लान्त हो आश्रय लिया जहाँ....... वो है विहँग नीड़
शुक्रवार, 23 दिसंबर 2016
इसतरह से हमें वो भुलाने लगे।
ख़ाक अपनी हवा में उड़ाने लगे।
*
हमने यूँ ही उन्हें बेवफ़ा जो कहा,
आसमाँ अपने सर पे उठाने लगे।
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नैन से नैन थोड़े मिले थे कि बस,
आईने रोशनी को चिढ़ाने लगे।
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आरज़ू जुस्तजू ख़्वाहिशें हसरतें
स्वप्न नैनों में कुछ चहचहाने लगे।
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आँधियाँ बारिशें बिजलियाँ आगयीं
आशियाँ प्यार का जब बनाने लगे।
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होंट पलकों पे उसने रक्खे जिस घडी,
अक्स माजी के सब थरथराने लगे।
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बेख्याली में झटकी जो जुल्फें ज़रा,
सारे मौसम मुझे गुनगुनाने लगे।
*
'मौली' जन्मों के तप का सिला ये मिला,
बस मिले और फिर आज़माने लगे।
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