तुम्हारी खोज से क्लान्त हो आश्रय लिया जहाँ....... वो है विहँग नीड़

गुरुवार, 15 दिसंबर 2016

चाहत

मौसमों में चाहतों के रंग भरना चाहिये।
कुछ न कुछ ख़ामोशियों के दिल धड़कना चाहिये।

मेरा दिल कबतक हथेली पर मेरी तन्हा रहे,
तुझको भी तो जिस्म से बाहर निकलना चाहिए।

कैसे मानूं प्यार के इस खेल में माहिर है तू,
आँसुओं के ज़ख़्म से बिछड़न उबलना चाहिए।

रुसवाईयाँ,तन्हाईयाँ,दर्द,आहें और तड़प,
ऐसे मौसम में मुझे अब खुलके हँसना चाहिए।

सिसकियाँ तन्हाईयाँ रुस्वाईयाँ आहें तड़प,
ऐसे मौसम में मुझे कुछ खुलके हँसना चाहिए।

आज़माइश साज़िशें हैं मैं हूँ और क़िस्मत मिरी,
सोचती हूँ किसकी आँखों को छलकना चाहिए।
      मौली

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