तुम्हारी खोज से क्लान्त हो आश्रय लिया जहाँ....... वो है विहँग नीड़

बुधवार, 23 मार्च 2016

अबके फागुन

अबके फागुन कुछ यूँ मनायें नफरतों को करें दहन प्रेम का अलख जलायें खेली बहुत खूनी होली बोलें अब इंसानियत की बोली फैली हर तरफ वैमनस्यता की आग अबके फैलायें मोहब्बतों का फाग नफरतों को तजकर एक मिसाल बनायें आओ मिलजुल कर मित्रता का उत्सव मनायें धर्म जाति मन्दिर मस्ज़िद के परे मानवता का एक सुंदर अध्याय रचें देशहित का ध्यान धरें मातृ भूमि को नमन करें प्रेम के सतरंगी रंगो में रंगकर शांति का नया इतिहास रचकर चलो न सब नित नये त्यौहार मनायें अबके फागुन कुछ यूँ मनायें।। मौली

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