तुम्हारी खोज से क्लान्त हो आश्रय लिया जहाँ....... वो है विहँग नीड़
सोमवार, 14 मार्च 2016
यक्ष प्रश्न
एक प्रश्न
जो कभी
नौनिहाल था
फिर तरुण हुआ
तत्पश्चात युवा
और फिर वृद्धावस्था
वो प्रश्न आज भी
प्रश्नवाचक चिन्ह
लिए ज्यों का त्यों
विधमान है।
अंततगोत्वा वो
यक्षप्रश्न बना हुआ है
क्या इस प्रश्न का उत्तर
ईमानदारी से कोई दे
पायेगा??
बूढ़ा जर्जर हो चला
प्रश्न और उत्तर...
नवयौवना सी इठलाती
चंचल नदी की मानिंद
उफनती उछलती
हर सीमाओं को लांघती
चली जा रही,बेचारा प्रश्न
आज भी उलझा अपनी
ही जाल में....
क्या हम मनुष्य का जन्म
पाकर भी मनुष्य बन पाएं
क्या हम अपने जन्म
को सार्थक कर पायें
कर्म धर्म का सामान्य
अर्थ भी समझ पायें
पशुओं को भी शर्मशार
कर हम इंसान कहलाते
हैं,ग्लानि का बोध तक
नही क्यों?
मौली
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