तुम्हारी खोज से क्लान्त हो आश्रय लिया जहाँ....... वो है विहँग नीड़

बुधवार, 30 मार्च 2016

तेरे ही रंग में रंगना चाहूँ पिया मैं तेरे प्रेम का ही सोलह श्रृंगार करूँ मैं तेरे ही ह्रदय के तरंगों पे करूँ नृत्य मैं तेरी गीत तेरी ग़ज़ल तेरी ही कविता की शब्द मैं तेरे ही बांहों के हाला में कैद होना चाहुँ मैं तुझे ही चाहुँ तुझसे चुराकर तुझमे ही समां जाऊँ आराध्य भी तू दुआ भी तू,तू ही पूण्य का फल तू ही आदि तू ही अंत दूजा न कोई मेरे संग मैं चातक जन्मों की प्यासी स्वाति की ही अभिलाषी प्रिय आलिंगन के मोहपाश में बंधने को आतुर बन गुजरिया राह तकूँ मैं तू न समझे पीर पराई .... किस विध जतन करूँ पिया मैं,तेरे दर्शन पाऊँ तेरे ही रंग रंगकर मैं अधरों पे सज जाऊँ..... बन मुरली की धुन तरंगित मैं हो जाऊँ.... मौली

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