ज़रा तो ठहरो... फ़ेर के निगाहें जाने वाले...
भ्रम के मायाजाल से निकलने तो दो.....
रिश्ते के ढाई आखर को सहेजने तो दे
पन्नें, मेरे भरोसे के बटोरने तो दे.....
चले जाना के पलकों के कतारों को भींग जाने तो दे..... सिरहाने रख दूँ दुआएं ये मोहलत तो दे....
फरेब की सिलवटों को जी भरके फिर देखने तो दे.....
जा ...के अब न मिलूंगी फिर दोबारा कभी
मुझे बुत में ज़रा तब्दील होने तो दे......
मुझे बुत में ज़रा तब्दील होने तो दे....
मौली।।
तुम्हारी खोज से क्लान्त हो आश्रय लिया जहाँ....... वो है विहँग नीड़
मंगलवार, 13 सितंबर 2016
बुत
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