विहँग नीड़
तुम्हारी खोज से क्लान्त हो आश्रय लिया जहाँ....... वो है विहँग नीड़
शनिवार, 30 अप्रैल 2016
कितने कच्चे थे न तेरे वो उम्मीद के धागे
नित टूटते हैं नित नये गाँठ पड़ते जा रहे।।
मौली
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