नारी हूँ मैं
कोमलांगी हूँ
सह्रदय हूँ
जननी हूँ
भगिनी हूँ
भार्या हूँ
बेटी हूँ
देवी,धरित्री
प्रकृति भी हूँ
मोहपाश में
बन्धी हुई
कोमल ह्रदया
त्याग की मूर्ति
तो सहनशीलता
की पराकाष्ठा भी मैं
अनगिनत रूप मेरे
कितने ही
अलंकारों से
अलंकृत!!!
"नारी"
फिर भी अभिशापित
क्यों ??
मेरे बिन अपूर्ण
ये संसार...
फिर क्यों, क्यों
कन्या भ्रूण हत्या ?
क्यों क्रूर प्रपंच
कोख में अजन्मी
मेरे अस्तित्व को
निर्मूल करने की?
हा रे हंता..
मौली
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