बुत बन चुकी मेरी ख्वाहिशों को जज़्बातों की आग से यूँ न दहकाओ जो पिघलने लगी तेरे इश्क में सनम तो कहीं फिर न हों उम्मीदों की नुमाइशें।। मौली
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