तुम्हारी खोज से क्लान्त हो आश्रय लिया जहाँ....... वो है विहँग नीड़
शुक्रवार, 25 नवंबर 2016
हिज़्र
आकर दबे पांव शब यूँ चली जाती है रोज़
पसरे हुए सन्नाटों में सिर्फ सुना जाती है सोज़
कभी तुम भी तो नींद से उठकर देखो ज़रा
हिज्र की तन्हा रातों के मंज़रों का ओज़।।
२५.११.२०१६
मौली
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