तुम्हारी खोज से क्लान्त हो आश्रय लिया जहाँ....... वो है विहँग नीड़
मंगलवार, 24 दिसंबर 2013
३१- रात मेरी यूँ सँगीन
यादों को आने से कौन रोक पाया भला
कदम उस तरफ़ मुड़ते हैं आज भी
जिधर उनके कदमों की आहट थी कभी
हर दस्तक अब भी चौंकाती है मुझे
सहर न होगी रँगीन फ़िर कभी
दिल भी है गमगीन, रात मेरी यूँ सँगीन।।
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